अपना और बेगाना

मुझे था धरा पर अकेले  आना। मुझे है धरा से अकेले जाना। रुपये नहीं है पूंजी नहीं है न बैठने के लिए अंगना। कोई नहीं है किसी का साथी अपना और बेगाना। मुझे था धरा पर अकेले आना। मुझे है धरा से अकेले जाना। पत्नी नहीं है बेटी नहीं है बचाने के लिए न सेना। […]

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संभल जा यारो

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संभल जा यारो

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“जात पात का नाम आज भी है”

21स्वी सदी की इस दुनिया में जात पात का नाम आज भी है खून खोलता है  मेरा , जब धर्म के नाम पर लहू बहता आज भी है…. बचपन में तालीम मिली सब धर्म एक है, जब होश आया तब हुआ महसूस ये  तो बस एक खेल है… मैं हिन्दू मुसलमान या  इसाई नहीं , […]

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*आतंकी बंद कर तेरा व्यापार*

        आतंकी बंद कर तेरा व्यापार मिट्टी पानी बनकर लहू बहे,                 फैला आतंक का व्यापार। हर बून्द खून की, हमसे करे पुकार।। छलनी सीना हो रहा, सर देह से गोली पार। देखो कितना फैल गया, मौत का व्यापार।। उरी हमला एयरबेस में, आंतक घुसा सैनिक […]

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आया वसंत मन भाया वसंत

आया वसंत मन भाया वसंत, मीठी सी खुशवू लाया वसंत, चहूँ और से खुशवू आती, खुशवू चुरा लाया वसंत, आया वसंत….. ..। फूली फसल आई हरियाली, पंछी नाच रहे दे ताली, कूँ-कूँ-कुँ आवाजें आती, कोयल को बुला लाया वसंत, आया वसंत……। सूरज निकला चिड़ियाँ चहँकीं, फूली कलियाँ धरती महकी , चारों ,तरफ आई खुशहाली, खुशहाली […]

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*प्रकृति की रहस्यमय सीख*

प्रकृति ने इस अनूठे जग को, कई रंगों से सजाया, हौसलों से उड़ानों को, फिर से जीना सिखाया। मिला इस जहां में जो भी ,उसने दूसरों को हसाया, सोंधी  मिट्टी की खुशबू का राज,इंसानों से छुपाया। विश्वास की डोर जीने का पैगाम, दिल से निभाया, पानी की कल-कल धारा को,इठलाना सिखाया। पवन की धीमी रफ्तार […]

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इंतजार

आखों को इंतजार है मंजिल को पाने का, उस उम्मीद में, राह पर टिकी है वो आखें, अधेरें को रोशनी का, चांद को चांदनी का, कली को खिलने का, खुशबू को फैलने का, उसी तरह आखों को इंतजार है, सपनों के पूरे होने का। बंद दरवाजे को खुलने का, राहगीर को रास्ता पूर्ण करने का, […]

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कविता – फटाफट चल पड़

धार को तेज कर चाल को बढ़ा कर नजर को भेद कर फटाफट चल पड सब कुछ जान ले होश से काम ले राम का नाम ले फटाफट चल पड कान भी कड़े हैं रोंगटे खड़े हैं होश भी उड़े हैं फटाफट चल पड़ नजर को बदल कर राह में सम्हल कर नियम पर अम्ल […]

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चिर विभूति की ओर

एक दिवस ना जाने किस दृश्य को भूला ना पाया होगा ‘वो’ न जाने कहाँ से आया होगा। शिथिल शांत स्वरों के बीच, निरभ्र अंबर को देखे जा रहा था भाव कुछ ऐसे उदासीन सदृश पर, किस दृश्य को निरेखे जा रहा था! सच ही जीवन बहुत विकट क्लिष्ट है समझ गहन जिसकी परिभाषा है […]

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