नारी=ना हारी

“नारी जो हम सभी का दुख हर लेती हैं हम उसे ही क्यों दुख देते हैं” “नारी जो हमारे घर का मान-सम्मान बढ़ाती हैं फिर हम उससे ही उसका मान-सम्मान क्यों छीन लेते हैं” “नारी जो कभी किसी मुसीबत से ना हारे हम उससे उसकी इज्ज़त ही छीन कर क्यों हरा देते हैं” “नारी जो […]

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कुछ तो बाकी है

कुछ तो बाकी है…. दोस्तों की दोस्ती में मेरा किरदार कुछ बाकी है, तुम मिल ना सके कुछ वक़्त के लिए मगर हर वक़्त इंतजार बाकी है, तुम सब जिंदगी में वो एहसास हो मेरे मस्ती भरा वो लम्हा बाकी है, ना लड़ाई है,ना झगड़ा है, सबको अपनी अपनी मजबूरी ने जकड़ा है फिर भी […]

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माँ

तेरा स्पर्श, तेरा एहसास, वो आलिंगन किया जाना, तेरे होने से मेरा इस जहांन में, यूँ जिया जाना, वो तेरी गोद में सिर रख करके, दुनिया भूल ही जाना, तेरी ममता की आँचल में यूँ, वो अमृत का पिया जाना, कभी खुद के ही आँसू पोंछ कर, यूँ चुप करा जाना, कभी गोदी, कभी कंधे […]

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“मिल आई पापा से अपने”

मुझको याद नहीं कब पापा संग में मेरे रहते थे, गोदी में कब खेली उनके कब उनसे में बोली थी। नील गगन में उड़ते पंछी मुझको भी संग ले ले तू तुझ संग उड़कर नील गगन में मैं भी नभ छू आऊंगी संग तेरे पंखों का पाकर पापा से मिल आऊंगी मॉ से सुना है […]

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ओणम का प्यारा त्यौहार

केरल में वार्षिक आता है, दस दिवसीय एक त्यौहार, फसल कटाई का त्यौहार, ओणम का प्यारा त्यौहार ! कोलावर्षम के छिंगम माह, ग्रेगोरियन के अगस्त माह, ओणम का प्यारा त्यौहार! अदरक इलायची धान पके, धन आगमन झूमे किसान, करते पूजा श्रावण देवता, पुष्प देवी रंगोली समर्पित, ओणम का प्यारा त्यौहार! सूर्य चले सिंह राशि ओर, […]

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बस औरत बन जीना चाहती हूं…….

सुख में सबके संग होती हूं, दुख में अकेली रह जाती हूं। दुनिया की नज़रों में मै कुदरत का करिश्मा कहलाती हूं, मेरा परिचय किसी का मोहताज नहीं, अपनी कहानी अपनी जुबानी में कहती हूं, मै वो आग हूं सीने की जो चूल्हों में झोक दी जाती हूं, आंखो में उड़ने का ख्वाब लिए , […]

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कैक्टस और गुलाब l

कौवा काला कोयल काली, रंग दोनों का एक समान l एक कर्कश दूजी मधुर, अंतर दोनों में जमीन आसमान l एक अनादरित दूजा समादरित, होते दोनों अपनी जुबान l सर्वग्राही मानव की होती, सदा इसी से ही पहचान l मधुर आचरण जुबा सरस व्यक्ति, हर जगह पुकारे जाते हैं l धूर्त और मक्कार लोग, हर […]

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एक कवि

एक कवि, …..   डूबना चाहता है उस रस में जो, प्रतिदिन सुप्त होता जा रहा है सांसारिक क्रिया में। जगाना चाहता है जन जन में वह मधुरता जो होनी चाहिए थी, किन्तु रही नहीं।   समेट लेना चाहता है सारा मीठापन शब्दों में, चुन चुनकर भिगोता है शब्द, संजोता सुगन्धित कर उन्हें ताकि महक […]

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परम प्रतापी देश। 

यह   परम   प्रतापी   भारतवर्ष      हमारा बहती  जिसमें  गंगा-  यमुना  की    धारा, सदियों से इसमें पाप सकल  धुल   जाता पावन-जल में संताप सकल  घुल   जाता। युग -युग से रक्षित  करता  इसे  हिमालय उत्तुंग शिखर पर स्थित  दिव्य- शिवालय, तन पर हिम की सित चादर डाल खड़ा   है बाधक दुश्मन […]

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देश हो खुशहाल। 

‘समृद्ध- भारत’ चाह   मेरी मंजिलें   व    राह      मेरी, फँस तिमिर  के  पाश    में न   हो    कभी        बेहाल। देश हो  खुशहाल। व्याधि, पीड़ा अब न   जकड़े सठ कुपोषण आ न    पकड़े, हो न  किल्लत  औषधि  की मिले         रोटी    –     दाल। […]

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