भारत के नागरिकों के मूल अधिकार-

नागरिकों के मूल अधिकार वे अधिकार होते हैं ,जो व्यक्ति के चतुर्मुखी विकास हेतु आवश्यक समझे जाते हैं । भारत के संविधान ने अपने नागरिकों को वे  सभी अधिकार दिये हैं , जिसका प्रयोग करके व्यक्ति अपनी- अपनी क्षमता के अनुसार उत्तरोत्तर विकास के पथ पर आगे बढ़ सकता है । उसी मूल अधिकारों की बदौलत नागरिकों को यह आभास होता है कि हम एक लोकतांत्रिक देश में  रह रहें हैं ।

     सबसे अच्छी बात तो यह है कि यदि हमारे मौलिक अधिकारों का हनन होता है तो उसके रक्षा के लिए खुद न्यायालय खड़ा होता है , और हमें अपने अधिकारों के प्रयोग करने हेतु आदेश पत्र जारी करता है । जहां कहीं भी यह महसूस हो कि हमारे मौलिक अधिकारों का हनन होता है तो न्यायालय में प्रार्थना पत्र देकर हम याचना कर सकते हैं । हमारे प्रार्थना पत्र पर विचार करते हुए न्यायालय द्वारा मौलिक अधिकारों की रक्षा की जाती है ।

           भारतीय संविधान के भाग 3 में अनुच्छेद 12 से 35 तक मौलिक अधिकारों का विस्तृत वर्णन किया गया है । भारतीय संविधान के भाग 3 को “भारत का मैग्नाकार्टा” कहा जाता है । जो पूर्ण रूप से सही है । भारत का मूल अधिकार अमेरिका के संविधान से लिया गया है । भारत के सभी नागरिक चाहे वे किसी भी राज्य, धर्म ,भाषा ,लिंग ,जाति आदि के हो सबको एक समान रूप से अपने मौलिक अधिकारों के प्रयोग की आजादी है । भारत के प्रत्येक नागरिक को अपने  मौलिक अधिकारों पर गर्व है ।

नागरिकों के मूल अधिकारों का वर्णन-

   भारतीय संविधान के भाग 3 में अनुच्छेद 12 से 35 तक मौलिक अधिकारों का वर्णन किया गया है।  प्रारंभ में नागरिकों को 7 मौलिक अधिकार दिए गये थे । जिसमें ‘ संपत्ति का अधिकार ’  को मौलिक अधिकार से हटा दिया गया है | ‘संपत्ति के अधिकार’ को 44 वें संविधान संशोधन 1978 द्वारा हटाकर संविधान के भाग 12 में अनुच्छेद 300- क , के तहत कानूनी अधिकार बना दिया गया है ।

इस प्रकार भारतीय संविधान द्वारा नागरिकों को 6 मूल अधिकार दिए गए हैं ,जो इस प्रकार हैं-

1. समता या समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14 से 18)

2. स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19 से 22)

3.शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23 से 24)

4.धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25 से 28)

5.संस्कृति एवं शिक्षा संबंधी अधिकार (अनुच्छेद 29 से 30)

6.संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32)

इन सभी मौलिक अधिकारों का सामान्य परिचय क्रमशः निम्नलिखित है  –

1 समता या समानता का अधिकार

संविधान द्वारा भारतीय नागरिकों को अनुच्छेद 14 से 18 तक समानता का अधिकार दिया गया है | जिसका विवरण निम्नलिखित है-  

(क). विधि के समक्ष समानता

       भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में यह उल्लिखित किया गया है कि कानून के समक्ष सभी व्यक्ति समान है । ‘समान ‘ शब्द का अर्थ है कि धर्म ,जाति ,वर्ण आदि के आधार पर कानूनी प्रक्रिया से किसी को वंचित नहीं किया जायेगा । कानून के समक्ष सभी व्यक्ति बराबर हैं । ऐसा नहीं होगा कि किसी व्यक्ति को विशेष सुविधा मिलेगी ,किसी को कम । कोई भी कानून सभी के ऊपर समान रूप से लागू होगा ।

(ख). विभेद का प्रतिषेध

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 में कहा गया है कि राज्य किसी भी नागरिक के प्रति केवल धर्म ,वंश ,जाति ,लिंग या जन्मस्थान को लेकर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करेगा । सार्वजनिक स्थानों ,होटल ,सड़क ,धर्मशाला, घाट आदि स्थानों में उसके उपयोग पर किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं किया जायेगा । यदि किसी भी नागरिक के साथ कोई भेदभाव किया जाता है तो राज्य का उत्तरदायित्व है कि उसके साथ हो रहे भेदभाव को संज्ञान में लेकर उचित कार्यवाही करें ।

(ग). अवसर की समानता

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16 में यह व्यवस्था दी गयी है कि राज्य द्वारा किसी भी नियुक्ति में सभी को समान अवसर दिया जायेगा । धर्म ,वंश ,जाति आदि के आधार पर किसी को अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता है ।

         अनुसूचित जाति ,अनुसूचित जनजाति तथा पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गयी है । उनको आरक्षण की व्यवस्था इस कारण की गयी है कि उनको मुख्यधारा में लाया जा सके । वे बहुत सालों तक अशिक्षित एवं उपेक्षित थे । जब तक वे समकक्ष नहीं हो जाते तब तक उन्हें आरक्षण का लाभ मिलेगा । मोदी सरकार द्वारा आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10% आरक्षण का प्रावधान किया गया है ।

(घ). अस्पृश्यता का अंत –

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 में अस्पृश्यता को समाप्त कर दिया गया है । देश का कोई भी नागरिक किसी भी नागरिक के साथ जातिगत या सामाजिक रूप से भेदभाव नहीं कर सकता । यदि कोई व्यक्ति ऐसा आचरण करता है तो कानून की दृष्टि से उसे अपराध माना जायेगा । भारतीय संविधान यह निर्देशित करता है कि राज्य सरकारें यह सुनिश्चित करें कि ऐसी घटनाएं न हों । यदि अस्पृश्यता से संबंधित कोई घटना होती है तो तुरंत कानूनी कदम उठाये ।

(ङ). उपाधियों का अंत

  भारतीय संविधान के अनुच्छेद 18 द्वारा उपाधियों का अंत कर दिया गया है । औपनिवेशिक शासन के समय दी जाने वाली उपाधियां जैसे- महाराजा ,रायबहादुर ,राजा साहब ,राजबहादुर आदि को समाप्त कर दिया गया है ।

         सेना या विद्या संबंधी उपाधि दी जायेगी । इसके अतिरिक्त कोई भी उपाधि प्रदान नहीं की जायेगी । राष्ट्रीय पुरस्कारों की स्थापना 1954 में हुई । मोरारजी देसाई की जनता पार्टी की सरकार ने उनका क्रम तोड़ दिया । सन् 1980 ई. में इंदिरा गांधी की सरकार ने पुनः प्रारंभ कर दिया ।

2. स्वतंत्रता का अधिकार

    भारतीय संविधान द्वारा अनुच्छेद 19 से 22 तक भारतीय नागरिकों को “स्वतंत्रता का अधिकार”  दिया गया है जिसका विवरण निम्नलिखित है  –

[क]. अनुच्छेद 19 द्वारा 6 अधिकारों की रक्षा-

प्रारंभ में अनुच्छेद 19 में 7 अधिकार थे । परंतु संपत्ति को खरीदने , बेचने के अधिकार को 1978 ई. में 44 वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा समाप्त कर दिया गया । 6 अधिकार हैं :-

(i). वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

(ii) शांति पूर्वक और बिना हथियार के सभा करने की स्वतंत्रता

(iii) संघ या सहकारी समितियां बनाने का अधिकार

(iv) भारत के राज्य क्षेत्र में कहीं भी आने- जाने की स्वतंत्रता

(v) भारत के किसी भाग में बसने एवं निवास करने की स्वतंत्रता

(vi) कोई भी पेशा ,व्यापार या कारोबार करने की स्वतंत्रता

              इन अधिकारों की सामान्य जानकारी इस प्रकार हैं-

(i) वाक् (भाषण )एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता –

      भारत के प्रत्येक नागरिक को भाषण देने , अपना विचार प्रकट करने ,विश्वास एवं अभियोग लगाने की स्वतंत्रता दी गयी है । किसी विशेष परिस्थितियों में राज्य भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगा सकता है  । प्रतिबंध लगाने के आधार हैं – भारत की एकता एवं संप्रभुता ,  राज्य की सुरक्षा ,सार्वजनिक आदेश ,न्यायालय की अवमानना , किसी अपराध में संलिप्तता आदि ।

         उच्चतम न्यायालय ने भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में निम्नलिखित अधिकारों को सम्मिलित किया है –

(i) अपने विचार या किसी अन्य के विचारों को प्रसारित करने का अधिकार

(ii) प्रेस की स्वतंत्रता

(iii) व्यवसायिक विज्ञापन की स्वतंत्रता

(iv) फोन टैपिंग के विरुद्ध अधिकार

(v) प्रसारित करने का अधिकार अर्थात सरकार का मीडिया पर एकाधिकार नहीं है ।

(vi) किसी राजनीतिक पार्टी या संगठन द्वारा आयोजित बंद के खिलाफ अधिकार

(vii) सरकारी गतिविधियों की जानकारी का अधिकार

(viii) शांति का अधिकार

(ix) किसी अखबार पर पूर्ण प्रतिबंध के विरुद्ध अधिकार |

(x) प्रदर्शन एवं विरोध का अधिकार । परंतु हड़ताल का अधिकार नहीं है ।

(ii) शांतिपूर्वक बिना हथियार के सभा करने की स्वतंत्रता-

       भारत के नागरिकों को बिना किसी हथियार के संगठित होकर सभा करने की स्वतंत्रता है । सभा को सार्वजनिक स्थान पर करना होगा । सभा शांतिपूर्वक होनी चाहिए ।इसमें किसी प्रकार की हिंसा नहीं होनी चाहिए |  इस अधिकार में हड़ताल का अधिकार शामिल नहीं है ।

       राज्य सरकार को यह अधिकार है कि विशेष परिस्थितियों में अपराधिक व्यवस्था की धारा 144 (1973 )के तहत सभा सम्मेलन को रोका जा सकता है । परंतु इसके लिए निम्न कारण हो सकते हैं – जैसे  – स्वास्थ्य एवं सुरक्षा ,मानव जीवन के लिए खतरा ,दंगा भड़काने आदि ।

(iii) संघ या सहकारी समितियां बनाने का अधिकार-

भारतीय नागरिकों को संज्ञा समितियां बनाने का अधिकार दिया गया है । इसमें राजनीतिक दल बनाना ,फर्म , क्लब ,व्यापार संगठन ,संगठन ,कंपनी आदि बनाने का अधिकार दिया गया है ।

(iv) भारत के राज्य क्षेत्र में कहीं भी आने-जाने की स्वतंत्रता-

भारत के संविधान द्वारा प्रत्येक नागरिक को यह स्वतंत्रता दी गयी है कि वह भारत के किसी भी क्षेत्र में बेरोकटोक कहीं भी आ जा सकता है । देश के अंदर उसे कहीं भी भ्रमण करने की आजादी है । इस प्रकार की आजादी से राष्ट्रीय सोच को बढ़ावा मिलता है ।

(v) भारत के किसी भी भाग में बसने एवं निवास करने की स्वतंत्रता –

भारत के नागरिकों को भारत के भू भाग पर बसने एवं निवास करने की स्वतंत्रता दी गयी है । भारत के नागरिक कहीं पर भी स्थायी एवं अस्थायी रूप से रह सकते हैं । परंतु उन्हें राज्य के बनाए गए नियमों का पालन करना होगा ।

(vi) कोई भी पेशा, व्यापार या कारोबार करने की स्वतंत्रता-

भारत के नागरिकों को यह अधिकार है कि वह कोई भी पेशा या व्यापार अपना सकते हैं । उन्हें कोई भी रोजगार करने के लिए जातिगत पेशे को अपनाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता । वह अपनी इच्छा अनुसार किसी भी कार्य को कर सकते हैं । कुछ ऐसे व्यवसाय होते हैं कि उन्हें करने के लिए उस कार्य की योग्यता होनी चाहिए , वहां उन्हें अपनी योग्यता का प्रमाण पत्र देना होगा ।

[ख]. अनुच्छेद 20 द्वारा अपराध के लिए दोष सिद्धि के संबंध में संरक्षण –

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 20 के तहत अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण प्रदान किया गया है । इसमें यह व्यवस्था है कि जब तक कोई व्यक्ति दोषी साबित नहीं हो जाता तब तक उसे अपराधी नहीं कहा जा सकता ।  किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक बार से अधिक अभियोजन और दंडित नहीं किया जायेगा । किसी अभियुक्त को स्वयं अपने विरुद्ध गवाही देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता ।

[ग]. अनुच्छेद 21 द्वारा प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता-

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में यह कहा गया है कि किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा अन्यथा नहीं । प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता की व्याख्या समय-समय पर उच्चतम न्यायालय ने की है । प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान के साथ जीने का अधिकार है । न्यायालय ने हमेशा मानवीय संवेदना को ध्यान में रखा है । सन् 1978 में मेनका गांधी बनाम भारत संघ के मामले में सर्वोच्च न्यायालय में अनुच्छेद 21 के संरक्षण के संदर्भ में निर्णय दिया कि किसी प्रक्रिया को निर्धारित करने वाला कानून उचित ,निष्पक्ष एवं तर्कसंगत होना चाहिए ।

      अनुच्छेद 21 क के अंतर्गत या घोषणा की गई है कि राज्य 6 वर्ष से 14 वर्ष तक की उम्र के बच्चों को नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा ग्रहण कराएगा ।  यह व्यवस्था 86 वें  संवैधानिक संशोधन अधिनियम 2002 के अंतर्गत की गयी है । भारतीय संसद ने बच्चों को नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम( RTE )2009 द्वारा यह व्यवस्था दी गई है कि 14 वर्ष तक की आयु के बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दी जाय ।

[घ]. अनुच्छेद 22 द्वारा निरोध एवं गिरफ्तारी से  संरक्षण-

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 22 द्वारा किसी व्यक्ति को गिरफ्तारी एवं विरोध से संरक्षण प्रदान किया जाता है । अनुच्छेद 22 के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को विशेष अधिकार प्राप्त है, जिसका सामान्य विवरण निम्न है-

(i) गिरफ्तारी करने के आधार को,  सूचना देने का अधिकार

(ii) अपनी पसंद के वकील (एडवोकेट) से परामर्श लेने का अधिकार ।

(iii) गिरफ्तारी के 24 घंटे के अंदर दंडाधिकारी (मजिस्ट्रेट) के सम्मुख पेश किए जाने और मजिस्ट्रेट के आदेश से बिना हिरासत में न रखने का अधिकार ।

3. शोषण के विरुद्ध अधिकार-

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 23 एवं 24 में शोषण के विरुद्ध अधिकार का वर्णन किया गया है ।  जिसका संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित है –

(क). मानव तस्करी एवं बलपूर्वक श्रम का निषेध  –

अनुच्छेद 23 में इसका वर्णन किया गया है । इसमें किसी भी महिला ,पुरुष या बच्चों की खरीद-फरोख्त पर रोक है । इसमें महिलाओं एवं बच्चों के साथ अनैतिक दूर्व्यापार तथा वेश्यावृत्ति पर भी रोक है । देवदासी और दास रखना भी प्रतिबंधित है । किसी व्यक्ति को बिना पारिश्रमिक दिए और उसे मजबूर करके काम लेना दंडनीय अपराध है । इस प्रकार के कृत्यों पर दंडित करने के लिए संसद ने अनैतिक दुर्व्यापार (निवारण) अधिनियम 1956 बनाया है ।

(ख) . कारखानों आदि में बालकों के कार्य करने पर रोक –

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 24 के अनुसार यह प्रावधान है कि किसी मिल ,फैक्ट्री, खान अथवा किसी भी निर्माण कार्य में 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को काम पर लगाना दंडनीय अपराध है । ऐसे अपराधों को दूर करने के लिए अनेक अधिनियम बने हैं, जो निम्न है –

बालश्रम ( प्रतिषेध एवं विनिमय ) अधिनियम 1986 , कारखाना अधिनियम 1948,, खान अधिनियम 1952, बागान श्रम अधिनियम 1951, मोटर परिवहन कर्मकार अधिनियम 1951, बीड़ी तथा सिगार कर्मकार अधिनियम 1966 आदि अधिनियम बने हैं ।

          बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन ) अधिनियम 1986 को संशोधन अधिनियम 2016 द्वारा इसके मूल अधिनियम का नाम बदलकर बाल एवं किशोर श्रम (निषेध एवं विनियमन ) अधिनियम 1986 कर दिया गया है ।

4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार –

 भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 तक धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है । इसका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है –

(क). धर्म को मानने ,आचरण करने एवं प्रचार – प्रसार की स्वतंत्रता –

   भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के अनुसार प्रत्येक नागरिक को अपने – अपने धर्म को मानने , आचरण करने एवं प्रचार – प्रसार की स्वतंत्रता है । भारत का प्रत्येक नागरिक अपने धार्मिक मान्यताओं का प्रचार – प्रसार बिना रोक – टोक के कर सकता है । धार्मिक पूजा , परंपरा एवं धार्मिक विचारों का प्रदर्शन कर सकता है । परंतु जबरदस्ती किया गया धर्मान्तरण मान्य नहीं है ।

(ख). धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता-

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 26 के अनुसार धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता प्राप्त है । धार्मिक कार्यों के लिए संस्थानों की स्थापना कर सकता है । इसके द्वारा प्रत्येक नागरिक धर्म विषयक कार्यों का प्रबंध करने एवं उसके स्वामित्व का अधिकार रखता है ।

(ग). धर्म की अभिवृद्धि हेतु कर छुट की स्वतंत्रता-

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 27 के अनुसार किसी भी व्यक्ति को धर्म की अभिवृद्धि हेतु कर के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता ।

(घ). धार्मिक शिक्षा में उपस्थित होने से स्वतंत्रता

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 28 के अनुसार राज्य निधि से संचालित किसी शिक्षा संस्था में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जा सकती । परंतु यह नियम उन न्यास या संस्थान में लागू नहीं होती ,जहां वे संस्था स्वयं अपने खर्चे से संचालित होती है । वहां भी धार्मिक शिक्षा या उपासना में भाग लेने के लिए किसी को बाध्य नहीं किया जा सकता ।

5. संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार-

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 29 एवं 30 में संस्कृति एवं शिक्षा संबंधी अधिकार दिए गये  हैं । इसका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है-

(क). अल्पसंख्यकों के हित का संरक्षण-

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 29 के अनुसार भारत में रहने वाले नागरिकों के प्रत्येक वर्ग को अपनी भाषा ,बोली ,लिपि , संस्कृति को सुरक्षित रखने का पूर्ण अधिकार है । इसके अतिरिक्त भारत के किसी भी नागरिक को राज्य के अंतर्गत आने वाली संस्थान या वित्त पोषित संस्थान में धर्म ,जाति या भाषा के आधार पर प्रवेश से रोका नहीं जा सकता । उच्चतम न्यायालय ने यह व्यवस्था दी है कि भाषा के संरक्षण हेतु आंदोलन करने का भी अधिकार है ।

(ख). शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना तथा उनके प्रशासन का अधिकार-

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 30 के अंतर्गत धर्म या भाषा पर आधारित सभी अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी रुचि की शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना तथा उनके प्रशासन का अधिकार दिया गया है । इसके साथ- साथ यह भी व्यवस्था की गई है कि शिक्षण संस्था में अनुदान देने में राज्य धर्म ,भाषा एवं अल्पसंख्यक होने पर भेदभाव नहीं करेगा ।

6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार-

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 32 मूल अधिकारों के संरक्षण का कार्य करता है । नागरिकों को जितने भी अधिकार मिले हुए हैं , यदि उसको पालन कराने के लिए कोई शक्तिशाली व्यवस्था नहीं रहेगी तो मूल अधिकारों का कोई महत्व नहीं रह जायेगा । इस प्रकार अनुच्छेद 32 मौलिक अधिकारों का रक्षक है । डॉ.अंबेडकर ने कहा है कि “एक अनुच्छेद जिसके बिना संविधान अर्थ विहीन है, यह संविधान की आत्मा और ह्रदय है ।

      यदि किसी नागरिक के मौलिक अधिकार का हनन होता है तो वह सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय की शरण ले सकता है । नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों द्वारा पांच प्रकार के लेखा (रिट) जारी किये जाते हैं । जिनका संक्षिप्त विवरण निम्न है – 

(क) बंदी प्रत्यक्षीकरण-

यह शब्द लैटिन भाषा से लिया गया है । इसका शाब्दिक अर्थ है “शरीर को प्रस्तुत किया जाय “। व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए इस रिट को जारी किया जाता है । यदि किसी व्यक्ति को जबरन हिरासत में रखा जाता है तो उस समय न्यायालय मामले की जांच करता है ।जांचोपरांत यदि पाया जाता है कि उस व्यक्ति को अवैध रूप से हिरासत में रखा गया है तो न्यायालय उसे तत्काल मुक्त करने का आदेश देती है ।

         “बंदी प्रत्यक्षीकरण” रिट सार्वजनिक प्राधिकरण और व्यक्तिगत दोनों के खिलाफ जारी किया जा सकता है ।

(ख) परमादेश –

‘ परमादेश ‘ का शाब्दिक अर्थ है “हम आदेश देते हैं “। यह रिट न्यायालय द्वारा उस समय जारी किया जाता है ,जब कोई सार्वजनिक अधिकारी अपने सार्वजनिक कर्तव्य का पालन नहीं करता । न्यायालय उनके कार्य और नकारने के संबंध में पूछता है । इसके बाद कर्तव्य पालन करने का आदेश जारी किया जाता है ।

        परमादेश रिट जिनको जारी नहीं किया जाता है , उनका संक्षिप्त विवरण निम्न है

(i). निजी व्यक्तियों या इकाई के विरुद्ध

(ii). ऐसे विभाग जो गैर-संवैधानिक हैं

(iii). संविदात्मक दायित्व लागू करने के विरुद्ध

(iv). भारत के महामहिम राष्ट्रपति महोदय या राज्यों के राज्यपालों के विरुद्ध

(v). उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जो न्यायिक क्षमता में कार्यरत हैं ।

(ग) प्रतिषेध –

‘प्रतिषेध ‘ का शाब्दिक अर्थ है ‘रोकना’ | यह आज्ञापत्र सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय द्वारा अपने अधीनस्थ न्यायालयों तथा अर्ध न्यायिक न्यायाधिकरणों को जारी किया जाता है ।इस रिट के तहत उन्हें यह आदेश दिया जाता है कि इस मामले में वह अपने यहां कार्यवाही न करें क्योंकि यह मामला उनके अधिकार क्षेत्र के बाहर है ।

(घ) उत्प्रेषण-

उत्प्रेषण का शाब्दिक अर्थ है ‘प्रमाणित होना ‘ या ‘ सूचना देना ‘। यह आज्ञापत्र उच्च न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायालयों को या अधिकरणों को जारी किया जाता है । जिससे वे अपनी शक्ति का दुरुपयोग करते हुए प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत को भंग न करें । उच्च न्यायालय इस संबंध में सूचना भी प्राप्त कर सकते हैं । सन् 1991 में उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि उत्प्रेषण व्यक्तियों के अधिकारों को प्रभावित करने वाले प्रशासनिक प्राधिकरणों के खिलाफ भी जारी किया जा सकता है ।


(ङ) अधिकार पृच्छा-

शाब्दिक संदर्भ में इसका अर्थ है –  “प्राधिकृत या वारंट के द्वारा” । यह रिट न्यायालय द्वारा तब जारी किया जाता है,  जब कोई व्यक्ति ऐसे पदाधिकारी के रूप में कार्य करने लगता है जबकि उसे उस पद पर कार्य करने का संवैधानिक अधिकार नहीं है । अतः यह किसी व्यक्ति द्वारा लोक कार्यालय के अवैध अनाधिकार ग्रहण करने को रोकता है ।

    इस रिट को किसी भी इच्छुक व्यक्ति द्वारा जारी किया जा सकता है ।

मूल अधिकारों का स्थगन-

क्या कभी मूल अधिकारों को रोका जा सकता है ? इस प्रश्न के उत्तर में कहा जा सकता है कि हां, रोका जा सकता है । जब देश में राष्ट्रपति द्वारा आपातकाल की घोषणा कर दी जाती है तो उस समय मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए कोई व्यक्ति न्यायालय में प्रार्थना पत्र नहीं दे सकता ।संकटकाल से अर्थ है- युद्ध ,बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह  । उस समय मौलिक अधिकार स्थगित रहते हैं ,परंतु “जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता ” के मौलिक अधिकार स्थगित नहीं रहते ।  इन दो मौलिक अधिकारों को छोड़कर सभी मौलिक अधिकार तब- तक स्थगित रहते हैं , जब तक समस्या का समाधान नहीं हो जाता ।


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