भारतीय संविधान की प्रस्तावना  

भारतीय संविधान की प्रस्तावना को “संविधान की भूमिका” के रूप में जाना जाता है ।  किसी भी पुस्तक की भूमिका में उसका सारतत्व छिपा रहता है । संविधान की प्रस्तावना में संपूर्ण भारतीय संविधान का सारतत्व निहित है । इसी बात को ध्यान में रखकर प्रसिद्ध न्यायविद् और संवैधानिक विशेषज्ञ नानी पालकीवाला ने प्रस्तावना को “संविधान का परिचय पत्र” कहा है ।

        भारतीय संविधान की प्रस्तावना पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा बनाए गये और पेश किए गये  ‘ उद्देश्य प्रस्ताव ‘ पर आधारित है । संविधान की प्रस्तावना में 42 वें संविधान संशोधन अधिनियम 1976 द्वारा संशोधित करके इसमें समाजवादी , धर्मनिरपेक्ष और अखंडता शब्द जोड़ा गया ।

    अपने वर्तमान स्वरूप में संविधान की प्रस्तावना इस प्रकार है –

” हम भारत के लोग ,भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न, समाजवादी ,धर्मनिरपेक्ष ,लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने के लिए और इसके समस्त नागरिकों को सामाजिक ,आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार ,अभिव्यक्ति ,धर्म ,विश्वास व उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए तथा व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता तथा अखंडता सुनिश्चित करने वाला ,बंधुत्व बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्पित होकर अपनी इस संविधान सभा में आज दिनांक 26 नवंबर 1949 को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत ,अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं । 

संविधान की प्रस्तावना में जोड़े गए शब्द-

संविधान की प्रस्तावना में 42 वें संविधान संशोधन अधिनियम 1976 द्वारा तीन शब्दों को जोड़ा गया । वे तीन शब्द है  – समाजवादी ,धर्मनिरपेक्ष और अखंडता ।

       इस मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय ने अपने पूर्व के दिए गए फैसले को पलटते हुए केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) में यह व्यवस्था दी कि प्रस्तावना संविधान का एक भाग है । संविधान की मूल भावना को ध्यान में रखकर इसमें निहित महान विचारों को संज्ञान रखकर संविधान का अध्ययन करना चाहिए । न्यायालय ने संविधान की प्रस्तावना में जोड़े गए शब्दों को वैध ठहराया ।

प्रस्तावना के घटक या तत्व-

       संविधान सभा की प्रारूप समिति के सदस्य रहे | के. एन. मुंशी के अनुसार —-“प्रस्तावना  हमारी संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य का भविष्यफल है ।”

संविधान के 4 मूल तत्व या घटक हैं । जिनका वर्णन निम्नलिखित है –

1. संविधान के अधिकार का स्रोत-

यह इस बात को व्याख्यायित करती है कि संविधान के अधिकार का स्रोत भारत की जनता के साथ निहित है । संविधान का मूलभूत आधार जनता है । संविधान में नीतियां जनता के सदुपयोग के लिए हैं ।

2. भारत की प्रकृति-

संविधान की प्रस्तावना में यह घोषणा की गई है कि भारत एक संप्रभु ,समाजवादी ,धर्मनिरपेक्ष ,लोकतांत्रिक एवं गणतंत्र प्रधान देश है ।

3. भारतीय संविधान के उद्देश्य-

संविधान भारत के सभी नागरिकों के लिए न्याय ,स्वतंत्रता एवं समानता को सुरक्षित करती है  और राष्ट्र की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए बंधुत्व को बढ़ावा देता है ।

4. संविधान लागू होने की तिथि-

प्रस्तावना में 26 नवंबर 1949 की तिथि का उल्लेख है | इस तिथि को संविधान को अपनाया गया था ।

प्रस्तावना में वर्णित मुख्य शब्दों की व्याख्या-

संविधान में वर्णित कुछ मुख्य शब्दों की व्याख्या निम्नलिखित है-

1. संप्रभुता-

प्रस्तावना में यह कहा गया है कि भारत एक संप्रभु देश है । “संप्रभुता”  शब्द का अर्थ है कि भारत किसी भी अन्य देश पर निर्भर नहीं है ,और न ही किसी देश का उपनिवेश है । भारत अपने किसी भी आंतरिक और बाह्य मामले का निस्तारण करने में सक्षम एवं स्वतंत्र है । संप्रभु होने के कारण भारत किसी भी समस्या निराकरण हेतु वैदेशिक नीति के तहत कानून बना सकता है । किसी विदेशी देश के साथ किस प्रकार का संबंध रखना है ,इसका निर्णय भारत देश स्वयं लेने में सक्षम है ।

2. समाजवादी-

भारतीय संविधान की प्रस्तावना में सन 1976 ई. में 42 वें संशोधन द्वारा ‘समाजवादी’ शब्द जोड़ा गया ।

        भारतीय “समाजवाद” को सीधे तौर पर साम्यवादी ,समाजवाद नहीं कहा जा सकता । भारतीय लोकतंत्र में समाजवाद व्यापक अर्थ में प्रयोग होता है । यहां सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के साथ एक साथ मिलकर राष्ट्र की उन्नति में सहयोग देती है । भारतीय लोकतंत्र में किसी प्रकार की असमानता को समाप्त करना ही ‘समाजवाद’ है । भारतीय समाजवाद गांधीवाद और मार्क्सवाद का मिला-जुला रूप है , जो अपने नागरिकों की भेदभाव को समाप्त करती है ।

3. धर्मनिरपेक्ष-

भारतीय संविधान की प्रस्तावना में सन् 1976 ई. में 42 वें संशोधन द्वारा धर्मनिरपेक्ष शब्द जोड़ा गया । धर्मनिरपेक्ष शब्द की मूल भावना है कि भारत के लोग स्वैच्छिक विचार से किसी भी धर्म को अपना सकते हैं । भारतीय संविधान में अनुच्छेद 25 से 28 तक मौलिक अधिकार के रूप में “धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार ” दिया गया है ।

4. लोकतांत्रिक-

भारतीय संविधान की प्रस्तावना में ही एक लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना की परिकल्पना की गयी है । भारतीय लोकतंत्र में जनता द्वारा प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से चुने गए प्रतिनिधि जनता के लिए कार्य करते हैं । यदि प्रतिनिधि सही रूप से कार्य नहीं करता है तो अगले चुनाव में जनता अपने मतदान (वोट ) द्वारा उसे हटा देती है । किसी भी लोकतांत्रिक देश में जनता को यह अधिकार प्राप्त है ।

    अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने लोकतंत्र की परिभाषा देते हुए कहा था कि “लोकतंत्र जनता का,जनता के लिए, जनता के द्वारा किया गया शासन है ।”

5. गणराज्य-

संविधान की प्रस्तावना में भारत को एक ‘गणराज्य ‘ कहा गया है ।   “भारतीय गणराज्य”  का प्रमुख राष्ट्रपति होता है । जो अप्रत्यक्ष रूप से 5 वर्ष के लिए चुना जाता है ।

6. न्याय –

संविधान की प्रस्तावना में सभी नागरिकों को सामाजिक ,आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय देने की बात की गयी है । किसी नागरिक के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जायेगा । भारतीय संविधान द्वारा अपने नागरिकों को न्याय देने के लिए स्वतंत्र न्यायपालिका की स्थापना की गयी है ।

7. स्वतंत्रता-

संविधान की प्रस्तावना में ही स्वतंत्रता की बात कही गयी है ।स्वतंत्रता का तात्पर्य है कि व्यक्ति स्वतंत्र रूप से अपने व्यवसाय ,धर्म ,उपासना आदि का चुनाव कर सकता है । भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 से 22 तक मौलिक अधिकार के रूप में “स्वतंत्रता का अधिकार” दिया गया है ।

8. समता (समानता)  –

भारत का संविधान अपने सभी नागरिकों को प्रत्येक क्षेत्र में नियमानुसार समान अवसर प्रदान करता है । भारतीय संविधान किसी भी नागरिक के साथ भेदभाव की अनुमति नहीं देता है ।  भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 से 18 तक मौलिक अधिकार के रूप में “समता का अधिकार” दिया गया है ।

9. बंधुत्व –

बंधुत्व से तात्पर्य है- भाईचारे की भावना । जब हम कोई भी कार्य मिलजुलकर करते हैं तो उसे हम बंधुत्व की भावना से किया गया कार्य कह सकते हैं । भारतीय संविधान बंधुत्व की भावना को प्रोत्साहित करती है | भारत देश की मुख्य विशेषता है कि भाषा ,धर्म ,समाज आदि में विविधता होते हुए भी बंधुत्व की भावना निहित है ।

10. एकता व अखंडता –

भारतीय संविधान की प्रस्तावना में एकता व अखंडता को बनाए रखने की बात कही गयी है ।भारतीय संविधान की प्रस्तावना में सन् 1976 ई. में 42 वें संशोधन द्वारा ‘अखंडता ‘ शब्द जोड़ा गया ।

      जिस देश में भाईचारे की भावना जितनी बलवती होगी ,उतनी ही एकता मजबूत होगी । भारतीय संविधान द्वारा राष्ट्र की एकता व अखंडता को बनाए रखने के लिए पर्याप्त दिशा- निर्देश दिए गये हैं । जिसका पालन करके हम भारतीय क्षेत्रवाद, जातिवाद ,भाषावाद एवं संप्रदायवाद से ऊपर उठकर राष्ट्र की एकता व अखंडता को बनाए रख सकते हैं ।


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