गोरखनाथ(लगभग 10वीं शताब्दी से 13वीं शताब्दी )-

गुरू गोरखनाथ का नाथ पंथ बौद्धों की वज्रयान शाखा से सम्बंधित है |84 सिद्धों में गोरखनाथ (गोरक्षपा) का नाम अंकित है |बाद में इन्होने अपना मार्ग अलग कर लिया जो नाथ पंथ के रुप में प्रसिद्ध हुआ | इनके गुरु मत्स्येंद्र नाथ थे | नाथ पंथ के आदि गुरु आदिनाथ (शिव) है |गोरखनाथ ने ईश्वर प्राप्ति से लेकर हठ योग की साधना का प्रवर्तन किया |


गुरु गोरखनाथ के रचनाओं के महत्वपूर्ण अंश निम्न है


(1)

नाथ बोले अमृत बाणी
वरिषेगी कंबली भीजैगा पाणी ।|
गाडी पडरवा बांधिले शूंटा, चले दमामा बाजिलै ऊंटा ।
कऊवा की डाली पीपल बासे, मूसा कै सबद बिलइया नासे ।|
चलै बटावा थाकी बाट, सोवै डूकरिया ठोरे षाट ।
ढूकिले कूकर भूकिले चोर, काढै धणी पुकारे ढोर ।|
उजड़ षेडा नगर मझारी, तलि गागर ऊपर पनिहारी ।
मगरी परि चूल्हा धून्धाई, पोवणहारा कों रोटी खाई ।|
कामिनि जलै अंगीठी तापै, विच बैसंदर थरहर काँपे ।
एक जु रढीया रढ़ती आई, बहू बिवाई सासू जाई ।|
नगरी को पाणी कूई आवै, उलटी चरचा गोरष गावै ।।

(2)

कुम्हरा के घर हांडी आछे अहीरा के घरि सांडी ।
बह्मना के घरि रान्डी आछे रान्डी सांडी हांडी ।
राजा के घर सेल आछे जंगल मंधे बेल ।
तेली के घर तेल आछे तेल बेल सेल ।
अहीरा के घर महकी आछे देवल मध्ये ल्यंग ।
हाटी मध्ये हींग आछे हींग ल्यंग स्यंग ।
एक सुन्ने नाना वणयां बहु भांति दिखलावे ।
भणत गोरष त्रिगुंण माया सतगुर होइ लषावे ।

(3)

हसिबा बेलिबा रहिबा रंग। काम क्रोध न करिबा संग।।
हसिबा षेलिबा गाइबा गीत। दिढ़ करि राषिबा अपना चीत।।
हसिबा षेलिबा धरिबा ध्यान। अहनिसि कथिबा ब्रह्म गियान।।
हसै षेलै न करै मत भंग। ते निहचल सदा नाथ के संग।।
हबकि न बोलिबा ढबकि न चलिबा धीरे धरिबा पांव।
गरब न करिबा सहजै रहिबा भणत गोरष रांव।।
धाये न षाइबा भूषे न मरिबा अहनिसि लैब ब्रह्म अगिनि का भेवं
हठ न करिबा पड़या न रहिबा यूँ बोल्या गोरष देवं।।

(4)

हिन्दू ध्यावै देहुरा
मुसलमान मसीत ।
जोगी ध्यावै परम पद
जहाँ देहुरा न मसीत ।।

(5)

बूझो पंडित ब्रह्म गियानम
गोरष बोलै जाण सुजानम ।
बीज बिन निसपती मूल बिन विरषा पान फूल बिन फलिया,
बाँझ केरा बालूड़ा प्यंगुला तरवरि चढ़िया ।
गगन बिन चन्द्र्म ब्रह्मांड बिन सूरं झूझ बिन रचिया धानम,
ए परमारथ जे नर जाणे ता घटि चरम गियानम ।
सुनि न अस्थूल ल्यंग नहीं पूजा धुनि बिन अनहद गाजै,
बाडी बिन पुहुप पुहुप बिन सामर पवन बिन भृंगा छाजै ।
राह बिनि गिलिया अगनि बिन जलिया अंबर बिन जलहर भरिया,
यहु परमारथ कहौ हो पंडित रुग जुग स्याम अथरबन पढिया ।
ससमवेद सोहं प्रकासं धरती गगन न आदं,
गंग जमुन विच षेले गोरष गुरु मछिन्द्र प्रसादं ।।

(6)

यहु मन सकती यहु मन सीव
यहु मन पांच तत्त का जीव ।
यहु मन लै जै उनमन रहै
तो तीन लोक की वार्ता कहै ।।


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