वेद और वेदांग का परिचय

वेदों का परिचय –

वेद विश्व साहित्य की सबसे प्राचीन पुस्तक है | वेद शब्द विद् धातु ( विद् ज्ञान ) से धञ् (अ ) प्रत्यय करने पर बनता है | इसका अर्थ ज्ञान या जानना है | हमारे प्राचीन ऋषियों ने जो ज्ञान अर्जित किया है , उसका संग्रह वेदों के रूप में सुरक्षित है |वेदों के द्वारा उस काल के सामजिक, धार्मिक , राजनीतिक आदि ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है | वेद को श्रुति और निगम नाम से भी जानते है | श्रुति नाम जानने का कारण यह है कि गुरु वेदों को अपने शिष्यों को पढाते थे , तथा  शिष्य उसको सुनकर याद कर लेते थे | यह प्रक्रिया परम्परागत चलती रहती थी | इस कारण वेद को श्रुति कहा गया | वेदों को साभिप्राय,सुसंगत तथा उत्तम अर्थ बताने के कारण ‘ निगम ’ कहा जाता था |

निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि वेद ईश्वर की रचना नहीं है | वेद ऋषियों द्वारा अर्जित ज्ञान है | जो उस समय की सामाजिक , आर्थिक , राजनीतिक ,धार्मिक ज्ञान का बोध जनमानस को कराती है |वेदों की संख्या 4 हैं,  जिनके नाम हैं – ऋग्वेद , सामवेद, यजुर्वेद , अथर्ववेद ।

वेदों का रचनाकाल

वेदों का रचनाकाल निश्चित नहीं है | विभिन्न विद्वानों ने भिन्न –भिन्न विचार प्रस्तुत किये है |कुछ विद्वानों ने 1200 ई. पू. तो किसी ने 3 लाख वर्ष पूर्व की रचना माना है | जबकि अधिकतम 10000 वर्ष के पहले के इतिहास का भी कोई प्रामाणिक ज्ञान नहीं है |फिर भी हम कुछ प्रमुख विद्वानों के मतों से अवगत कराना चाहेंगे |

कुछ प्रमुख मतों का संक्षिप्त परिचय नीचे दिया जा रहा है –

प्रमुख भारतीय विद्वानों के मत –

  1. श्री स्वामी दयानंद सरस्वती – स्वामी दयानन्द सरस्वती का मत है कि वेद सृष्टि के आरम्भ में हुए है |वेदों का आविर्भाव परमात्मा से हुआ है | श्री रघुनंदन शर्मा भी इसी मत के समर्थक है |
  2. श्री बालगंगाधर तिलक – इन्होने ज्योतिष को आधार बनाकर ऋग्वेद का रचनाकाल 6000 ई.पू.से 4000 ई.पू.माना है | बालगंगाधर तिलक का मत भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानों से सामंजस्य स्थापित होता है | इन्होने 4000 ई. पू. को वेदों का रचनाकाल मानने पर बल दिया |
  3. श्री शंकर बालकृष्ण दीक्षित – इन्होने वेदों का रचनाकाल 3500 ई. पू. माना है |
  4. श्री अविनाश चंद्र दास – इन्होने एक मंत्र का उदाहरण देते हुए वेदों का रचनाकाल 25000 ई.पू.माना है | मंत्र इस प्रकार है – “एका चेतत् सरस्वती नदीनाम् ” ( ऋग्वेद – 7/92/2 )
  5. पंडित दीनानाथ शास्त्री – इन्होने अपनी पुस्तक “वेद काल निर्णय ” में वेदों का रचनाकाल तीन लाख वर्ष पूर्व माना है |
  6. डॉ. आर. जी. भंडारकर – इन्होने वेदों का रचनाकाल600 ई. पू. माना है |

 

पाश्चात्य विद्वानों के मत –

 

  1. विन्टर नित्स – इन्होने अपना समन्वयात्मक मत दिया कि वैदिक काल 2500 ई. पू. से 500 ई. पू. है | इन्होने ऋग्वेद का समय 2500 ई. पू. माना है |
  2. मैकडानल – 2000 ई. पू. से 1200 ई.पू. माना है |
  3. कीथ – इन्होने वेदों का रचनाकाल 1200 ई.पू. माना है |
  4. मैक्समूलर – इन्होने बुद्ध को आधार मानक वैदिक साहित्य का रचनाकाल 1200 ई. पू. माना है |

प्रमुख भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानों के रचनाकाल के सम्बंध में विभिन्न मत है | जहाँ स्वामी दयानंद ने वेदों को अपौरूषेय अर्थात परमात्मा से उत्पन्न माना है , वही बालगंगाधर तिलक ने 6000 ई. पू. से 4000 ई. पू. माना है |वेदों के रचनाकाल के सम्बंध में दो विचारधाराएँ आती हैं | प्रथम विचार धारा के लोग मानते है कि वेदों का रचनाकाल सृष्टि के प्रारम्भ से है | वेद ईश्वर के वचन हैं | इसे काल में नहीं बाँधा जा सकता है | दूसरे मत के लोग यह नही मानते है कि वेद ईश्वर के वचन है | वे 10000 ई. पू. से 500 ई.पू.के बीच वैदिक काल को निर्धरित करते है |

मेरा स्वयं का मानना है कि वेद विभिन्न ऋषियों द्वारा रचित रचना है | जो 500 ई.पू. के पहले की रचना है क्योंकि महामानव गौतम बुद्ध ने वेदों में वर्णित पशुबलि ,कर्मकाण्ड आदि का विरोध किया | बुद्ध ने अपने प्रचण्ड ज्ञान से तर्क को जन्म दिया तथा अंधविश्वास से जनता को मुक्त कराकर धर्म की अविरल धारा को जन्म दिया | संसार में लगभग 3000 भाषाएँ है | ईश्वर को भाषा में नही बांधा जा सकता है | ईश्वर अनुभूति का विषय है , जो शब्द से परे है | फिर भी मैं वेदों के रचनाकाल के विषय में कोई सटीक दावा नहीं कर सकता ,परंतु मेरा विश्वास है कि वेद मानव निर्मित रचना है |

वेदों का परिचय एवं वर्ण्य-विषय

हम यहाँ चारों वेदों का सामान्य परिचय एवं वर्णित विषय का अध्ययन करेंगे | जिसका विवरण निम्न है –

  • ऋग्वेद

    – ऋग्वेद को चारों वेदों में सबसे प्राचीन माना गया है | पतञ्जलि ने ऋग़्वेद की 21 शाखाओं का उल्लेख किया है | इनमें से केवल 5 शाखाओं की नाम उपलब्ध है | चरण व्यूह के अनुसार प्रमुख 5 शाखाएँ है –

  • शाकल
  • वाष्कल
  • आश्वलायन
  • शांखायन
  • माण्डूकायन

शाकलशाखा की ही ऋग्वेद संहिता प्रचलित है | ऋग्वेद को 10 मण्डलों में विभक्त किया गया है | इसमें 85 अनुवाक , 1028 सूक्त और 10552 मंत्र हैं | ऋग्वेद का विभाजन दूसरे प्रकार से भी किया गया है , जिसमें पूरे ऋग्वेद को 8 समान भागों में बाँटा गया है , जिसे ‘ अष्टक ’ कहते है | इस प्रकार ऋग्वेद में 8 अष्टक, 64 अध्याय , 2024 वर्ग और 10552 मंत्र हैं |

ऋग्वेद में ऋषियों द्वारा विभिन्न देवताओं का वर्णन एवं स्तुति की गयी है | इसमें ईश्वर के अनेक रूप ,पाप – पुण्य , सदाचार, हिंसा – अहिंसा, स्वर्ग – नरक , आस्तिक – नास्तिक , युग , कल्प , प्रलय , देव- असुर आदि का वर्णन किया गया है | देवों में अग्नि इंद्र , वरूण , अश्विनी , सरस्वती , मरूत आदि की स्तुति की गयी है |

ऋषियों के तुल्य नारियाँ भी वैदिक मंत्रों की द्रष्टा थी | ऋग़्वेद में 21 ऋषिकाओं का उल्लेख मिलता है | 21 महिला ऋषिकाओं के नाम हैं – श्रद्धा कामायनी , शची पौलोमी, , सार्पराज्ञी , यमी वैवस्वती,इंद्राणी , देवजामय: , इंद्रमातर:, रोमशा ब्रह्मवादिनी , शश्वती  आंगिरसी,गोधा ऋषिका, उर्वशी, सूर्या सावित्री , अदिति: दाक्षायणी ,  घोषा काक्षीवती,आपाला आत्रेयी ,नदी ऋषिका , लोपामुद्रा , विश्ववारा आत्रेयी , वाक् आम्भृणी , जुहु: ब्रह्मजाया , सरमा ऋषिका , यमी |

यजुर्वेद –

यजुर्यजते: , यज्ञ सम्बंधी मंत्रों को यजुस् कहते हैं | यजुस् के नाम पर ही वेद का नाम यजुस +वेद = यजुर्वेद , नाम पड़ा | इसमें यज्ञों और हवनों के विधान सम्बंधी ऋचाएँ हैं | यजुर्वेद मुख्यत: दो भागों में विभक्त है –

  • शुल्क यजुर्वेद
  • कृष्ण यजुर्वेद
  • शुक्ल यजुर्वेद – शुक्ल यजुर्वेद को ही माध्यन्दिन या वाजसनेयि यजुर्वेद भी कहते है | यह आदित्य सम्प्रदाय का प्रतिनिधि ग्रंथ है । इसमें यज्ञ में प्रयोग किया जाने वाला मंत्र है | इसमें व्याख्या , विवरण और विनियोगात्मक भाग नहीं है अर्थात् विशुद्ध है | शुद्धता के कारण ही इसे शुक्ल कहा गया है | शुक्ल यजुर्वेद की शाखाओं में दो प्रधान संहिताएँ उपलब्ध है –
  • माध्यंदिन या वाजसनेयि संहिता – इसमें 40 अध्याय और 1975 मंत्र हैं |
  • काण्व संहिता – इसमें भी 40 अध्याय और 2086 मंत्र हैं |वाजसनेयि संहिता से 111 मंत्र अधिक हैं | वाजसनेयि संहिता का प्रचार – प्रसार उत्तर भारत में तथा काण्व संहिता का प्रचार प्रसार महाराष्ट्र में अधिक है |
  • कृष्ण यजुर्वेद – कृष्ण यजुर्वेद ब्रह्म सम्प्रदाय का प्रतिनिधि ग्रंथ है | इसमें मंत्रों के साथ – साथ ब्राह्मण भी मिश्रित है, इसलिए मिश्रण के कारण इसे कृष्ण कहा गया | इसमें व्याख्या , विवरण और विनियोगात्मक भाग है | अर्थात विशुद्ध नहीं है ,मिश्रित है | कृष्ण यजुर्वेद की 4 शाखाएँ है ,जिनकी चार संहिताएँ उपलब्ध होती है | जिसका विवरण निम्न है –
  • तैत्तिरीय संहिता – यह कृष्ण यजुर्वेद की सबसे प्रमुख संहिता है | इसमें 7 काण्ड ,44 प्रपाठक और 631 अनुवाक है |
  • मैत्रायणी संहिता – इसमें मंत्र एवं व्याख्या भाग मिश्रित है | इसमें 4 कांड ,54 कांड और कुल 2144 मंत्र है | जिसमें से 1701 मंत्र ऋग़्वेद से लिए गए हैं |
  • काठक संहिता – इसे कठ संहिता भी कहते हैं | इसमें 40 स्थानक ,843 अनुवाक तथा मंत्रों की संख्या 3091 है |
  • कपिष्ठल – कठ संहिता – इसमें 6 अष्टकों में 48 अध्याय है । यह अधूरी संहिता है । इसमें अध्याय 9 से 24 , 32,33 तथा 43 खंडित है | इस संहिता पर भी ऋग्वेद का विशेष रूप से प्रभाव है |

यजुर्वेद कर्मकाण्ड का वेद कहा जाता है | यज्ञ करने की विधि – विधान का विस्तृत वर्णन है | यज्ञ करने वाले या यजुर्वेद के मंत्रों का उच्चारण करने वाले पुरोहित को अध्वर्यु कहते थे | इसमें अश्वमेध आदि यज्ञों का वर्णन है | यज्ञों और कर्मकाण्डों के अधिक प्रचलन से ब्रह्मणों का धार्मिक एवं सामाजिक महत्व बढ़ गया |

सामवेद

सामन् का अर्थ गान से है | प्राचीन आर्यो द्वारा सामवेद के मंत्रों का गायन किया जाता था | गायन किये जाने के कारण ही इसे सामवेद की संज्ञा दी गयी | चारों वेदों में आकार की  दृष्टि से सामवेद सबसे छोटा  हैं |सामवेद में मंत्रों की संख्या 1875 है |इनमें से 1771 मंत्र ऋग्वेद से लिया गया है | इस प्रकार 104 मंत्र ही सामवेद में नए  हैं | सामवेद को दो भागों में बाँटा गया है | (i) पूर्वार्चिक (ii) उत्तरार्चिक ।

 

  • पूर्वार्चिक – इसमें 4 काण्ड है – (अ) आग्नेय (ब) ऐंद्र (स) पावमान (द) आरण्य काण्ड और महानाम्नी आर्चिक है | इसमें 6 अध्याय और 650 मंत्र हैं |
  • उत्तरार्चिक – इसमें 21 अध्याय या 9 प्रपाठक और 1225 मंत्र हैं | इसमें कुल 400 सूक्त हैं | पुराणों के अनुसार सामवेद की एक सहस्त्र शाखाओं की जानकारी मिलती है | परंतु दिव्यावदान , प्रपंच हृदय , चरण व्युह तथा जैमिनि गृह सूत्र को देखने पर 13 शाखाओं का पता चलता है | 13 शाखाओं में से केवल तीन आचार्यों की शाखाएँ मिलती है | जिनके नाम है – कौमुथीय , राणायनीय ,जैमिनीय |

सामवेद में सोम , सोमरस ,सोमयाग , सोमपान आदि का विशेष महत्व वर्णित है | सोमरस का अर्थ जहाँ भौतिक रूप से मदिरा के रूप में लगाया जाता है, वही सोम का आध्यात्मिक अर्थ में ब्रह्म या शिवतत्व के सम्बंध में | ऋषियों ने मंत्रों का संकलन करके गायन की पद्धति विकसित की | यज्ञों के समय उद्गाता इन मंत्रों को गाता था | इस प्रकार सामवेद को सोम प्रधान वेद भी कह सकते है |  सामवेद की महत्ता बताते हुए गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं कि “ वेदानां सामवेदोsस्मि ” अर्थात् वेदों में मै सामवेद हूँ |

अथर्ववेद

अथर्ववेद चारों वेदों में चौथा एवं अंतिम वेद है | अथर्ववेद के रचयिता ऋषि अथर्व और ऋषि अंगिरा को माना गया है | अथर्ववेद के विभिन्न नाम हैं, जो इस प्रकार हैं – आंगिरस वेद , अथर्वागिंरस वेद , ब्रह्मवेद , महीवेद , भैषज्यवेद आदि | चरणव्यूह ग्रंथ के अनुसार अथर्ववेदकूनौ शाखाओं का उल्लेख मिलता है ,जिसमें केवल 2 शाखाओं का उल्लेख मिलता है , जिसमें केवल 2 शाखाएँ ही उपलब्ध है – (i) शौनकीय शाखा (ii) पैप्पलाव शाखा

जिसमें पूर्णरूप से शौनक संहिता ही उपलब्ध हो पाती है | जिसमें 20 काण्ड , 730 सूक्त एवं 5987 मंत्र है |

अथर्ववेद आर्य संस्कृति के साथ-साथ अनार्य संस्कृति से भी सम्बंधित है | वेदत्रयी में अथर्ववेद को शामिल नहीं किया गया है | अथर्ववेद में जादू-टोना ,सम्मोहन , वशीकरण , तंत्र – मंत्र , अनेक अंधविश्वास से सम्बंधित मंत्र है | इसके अतिरिक्त इस वेद में देवताओं की स्तुति , चिकित्सा, औषधिविज्ञान , भूगोल ,खगोल , आयुर्वेद , गम्भीर रोगों का निदान , अर्थशास्त्र के मौलिक सिद्धांत , प्रजनन विज्ञान , मृत्यु को दूर करने के उपाय आदि विषयों से सम्बंधित मंत्र है |

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वेदांग का परिचय –

वेदों के अर्थ ज्ञान में सहायक शास्त्र को वेदांग कहा गया है । वेदांगों के अध्ययन के उपरांत ही वेदों में वर्णित मंत्रों के सही अर्थ और उसकी व्याख्या को जाना जाता है । वेदंगों  का नामोल्लेख सर्वप्रथम मुंडकोपनिषद हुआ है ।-”  तत्रापरा ऋग्वेदों यजुर्वेद: सामवेदोsथर्ववेद: शिक्षा कल्पों व्याकरणं  निरुक्तं छंदों ज्योतिषमिती ।। [ मुंडक उपनिषद 1-1-5 ]

वैदिक कर्मकांड , यज्ञ विधि विस्तृत एवं व्यापक थे । उनकी स्पष्ट एवं वास्तविक अर्थ वेदांगों द्वारा ही जाना जाता था । वेदांगों की संख्या 6 है । (1)शिक्षा ,(2)व्याकरण ,(3)छंद ,(4)निरुक्त ,(5) ज्योतिष ,(6)कल्प । जिनको निम्न श्लोक द्वारा समझा जा सकता है-

शिक्षा व्याकरणं छंदो निरूक्तं ज्योतिषं तथा ।

कल्पश्चेति षडङ्गानि वेदस्याहुर्मनीषिण: । ।

पाणिनि शिक्षा में वेदांगों को पुरुष के अंगों के रूप में वर्णित किया गया है । इसमे6 छंद को वेदपुरूष का पैर , कल्प को हाथ , ज्योतिष को नेत्र , निरुक्त को कान , शिक्षा को नासिका तथा व्याकरण को मुख की संज्ञा दी गयी है । श्लोक निम्न है —

छंद: पादौ तु वेदस्य हस्तौ कल्पोSथ पठय्ते ।

ज्योतिषामयनं चक्षुर्निरूक्तं श्रोत्रमुच्यते ॥

शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य , मुखं व्याकरणं स्मृतम् ।

तस्मात् साङ्गमधीत्यैव ब्रह्मलोके महीयते ॥

[ पाणिनी शिक्षा ,श्लोक 41,42 ]

वेदांगों का वर्णन निम्न है –

  1. शिक्षा

    –     इसमें वेदों के शुद्ध उच्चारण की विधि बताई गई है । जहां स्वर एवं वर्ण आदि के शुद्ध उच्चारण की शिक्षा दी जाय, उसे ‘शिक्षा’ कहते हैं । वेदपाठी आचार्य वेदों के शुद्ध उच्चारण पर प्रमुख रूप से ध्यान देते हैं । इसमें किस स्वर का कहाँ और कैसे या किस प्रकार उच्चारण किया जाय , इसका अध्ययन और ध्यान दिया जाता है । शुद्ध उच्चारण के द्वारा ही भाषा अनादि काल तक सुरक्षित रहती है । प्राचीन काल के अनेक शिक्षा ग्रंथ हैं , जिन्होंने इस पर प्रकाश डाला है । प्रमुख शिक्षा ग्रंथ निम्न है – व्यास -शिक्षा , पाणिनीय- शिक्षा , नारद- शिक्षा , याज्ञवल्क्य- शिक्षा , भारद्वाज- शिक्षा , मांडूकी- शिक्षा , वशिष्ठ- शिक्षा आदि । जो उपलब्ध शिक्षा ग्रंथ हैं , उनकी संख्या 34 है इसमें पाणिनीय- शिक्षा एवं व्यास- शिक्षा का विशेष महत्व है ।

तैत्तिरीय उपनिषद में शिक्षा के 6 अंगों का वर्णन करते हुए कहा गया है । —

वर्ण: , स्वर: , मात्रा , बलम् , साम , संतान: , इत्युक्त: शिक्षाध्याय:

[ तै. उ. 1-2 ]

इसमें शिक्षा के 6 अंगों वर्ण , स्वर , मात्रा . बल , तथा संतान को बताया गया है । संक्षेप  में इनका वर्णन निम्नलिखित है ——

  • वर्ण – वर्णमाला का शुद्ध ज्ञान प्राप्त करना प्रत्येक वेदपाठी को अनिवार्य है । संस्कृत वर्णमाला में 63 या 64 वर्ण होते हैं । संवृत “ अ ” को विवृत “ अ ” से पृथक मानने पर 64 वर्ण हो जाते हैं ।
  • स्वर– स्वर तीन है – उदात्त, अनुदात्त और स्वरित । इनका ज्ञान आवश्यक है ।
  • मात्रा – स्वरों के उच्चारण में जो समय लगता है उसे मात्रा कहते है । स्वर की मात्रा के तीन भेद हैं – हृस्व , दीर्घ तथा प्लुत । ह्र्स्व की एक मात्रा , दीर्घ की दो मात्रा , तथा प्लुत की तीन मात्रा होती हैं । प्लुत को “ 3 ” चिह्न  से प्रदर्शित किया जाता है  ।
  • बल – वर्णों के उच्चारण में होने वाले प्रयत्न और उनके उच्चारण स्थान को ‘ बल ’ कहा जाता है । प्रयत्न के दो भेद है – आभ्यंतर तथा वाह्य
  • साम – स्पष्ट एवं सुस्वर से वर्णो का उच्चारण ‘ साम ’ कहलाता है ।
  • संतान – संहितापाठ में संधि नियमों का ज्ञान और उसका यथा स्थान प्रयोग करना इसके अंतर्गत आता है ।

(2)   व्याकरण

पाणिनीय  शिक्षा में व्याकरण को वेद पुरुष का मुख माना गया है । 6 वेदांगो में व्याकरण को महत्वपूर्ण वेदांग माना गया है । कात्यायन और पतंजलि ने व्याकरण के पांच प्रयोजन बताए हैं -रक्षा, ऊह , आगम , लघु और असंदेह ।

(3) छंद

वैदिक मंत्रों के उच्चारण के ठीक ज्ञान के लिए छंद की जानकारी और उनके प्रयोग का ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है । गायत्री ,अनुष्टुप, वृहती आदि छंदों की जानकारी आवश्यक है । पिंगल मुनि द्वारा प्रणीत “छंद सूत्र” प्राचीन छंद शास्त्र की पुस्तक है ।

(4) निरुक्त

निरुक्त के अंतर्गत शब्दों की उत्पत्ति और व्युत्पत्ति का वर्णन होता है । यास्क (800 ई.पू.) कृत ‘ निरुक्त ’  इस विषय का प्रमाणिक ग्रंथ है । यह निघंटु नामक वैदिक शब्दकोश पर आधारित है । इसी आधार पर वेदों के शब्दों की व्याख्या की जाती है । यास्क ने अपने ग्रंथ में अनेक पूर्ववर्ती निरुक्तकारों का वर्णन किया है , परंतु उनके ग्रंथ आज उपलब्ध नहीं है । प्रमुख उल्लेखनीय नाम हैं – औटुंबरायण , गार्ग्य  , कात्यक्य, और्णनाभ  आदि ।

(5) ज्योतिष –

वैदिक यज्ञों के शुभ अशुभ मुहूर्त निर्धारण के लिए ज्योतिष का ज्ञान होना आवश्यक है ।  सूर्य ,चंद्र ,मंगल ,बुध ,गुरु ,शुक्र ,शनि किस प्रकार गति करते हैं , सूर्य एवं चंद्र ग्रहण कब लगेंगे , तारकों की गति किस प्रकार होगी आदि विषयों पर “ ज्योतिष शास्त्र ” प्रकाश डालता है । आचार्य लगध मुनि प्रणीत “ वेदांग ज्योतिष ” एक प्राचीन ज्योतिष ग्रंथ है ।  इसका रचना का लगभग 1350 ई. पू. माना जाता है । सर्वप्रथम प्राचीन ग्रंथ होने के साथ यह ज्योतिष का आधार ग्रंथ है ।

(6) कल्प

वैदिक कर्मकांड में किस यज्ञ में कौन से मंत्रों का प्रयोग करना चाहिए इस प्रकार का निदर्शन ‘ कल्प ’ कहलाता है । कर्मकांड की संपूर्ण विधियों का वर्णन कल्पसूत्र ग्रंथों में होता है । इन ग्रंथों में यज्ञ संबंधी नियम दिए गए हैं । प्रमुख यज्ञ हैं – सोमयाग , वाजपेय, राजसूय, अश्वमेध ,दर्श ,पौर्णमास आदि । कल्पसूत्र चार भागों में विभक्त हैं जिनके नाम हैं – सौत सूत्र , गृह्य सूत्र ,धर्म सूत्र ,सुल्ब सूत्र ।

निष्कर्षत:  कहा जा सकता है कि वेदों की सटीक जानकारी एवं अर्थ को समझने हेतु वेदांगों की जानकारी आवश्यक है ।

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वेद और आचार्य

– नीचे एक तालिका दी गई है , जिसमें यह बताया गया है कि किस वेद के कौन आचार्य हैं ?

 वेद और आचार्य

वेदआचार्य
ऋग्वेदपैल
यजुर्वेदवैशम्पायन
सामवेदजैमिनि
अथर्ववेदसुमंतु

 

वेद और देवता –

नीचे एक तालिका दी गई है , जिसमें यह बताया गया है कि किस वेद के कौन देवता हैं ?

 वेद और देवता

वेददेवता
ऋग्वेदअग्नि
यजुर्वेदवायु
सामवेदआदित्य ( सूर्य )
अथर्ववेदसोम

 

वेद और ऋत्विक् –

नीचे एक तालिका दी गई है , जिसमें यह बताया गया है कि किस वेद के कौन ऋत्विक् हैं ?

  वेद और ऋत्विक्

वेदऋत्विक्
ऋग्वेदहोता
यजुर्वेदअध्वर्यु
सामवेदउद्गाता
अथर्ववेदब्रह्मा

 

वेद और उपवेद –

नीचे एक तालिका दी गई है , जिसमें यह बताया गया है कि किस वेद का कौन उपवेद हैं ?

 वेद और उपवेद

वेदउपदेव
ऋग्वेदआयुर्वेद
यजुर्वेदधनुर्वेद
सामवेदगांधर्ववेद
अथर्ववेदसर्पवेद

 

वेद और शाखा –

नीचे एक तालिका दी गई है , जिसमें यह बताया गया है कि किस वेद की कितनी शाखाएँ हैं ?

 वेद और शाखाएँ

वेदशाखा
ऋग्वेदशाकल , वाष्कल
यजुर्वेदमाध्यंदिन ( वाजसनेयि ) , काण्व , तैत्तिरीय , मैत्रायणीय , कठ , कपिष्ठल
सामवेदकौथुम , राणायनीय , जैमिनीय
अथर्ववेदशौनक , पैप्लाद

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