हिंदी : महत्त्वपूर्ण सूत्रात्मक ज्ञान / तथ्य / वचन / अवधारणा –

  • प्रसिद्ध आरती ‘ ओम जय जगदीश हरे ’ पंजाब के संस्कृत एवं हिंदी के विद्वान श्रद्धाराम फुल्लौरी द्वारा लिखा गया है | इनके द्वारा लिखा गया ग्रंथ ‘ भाग्यवती ’ उपन्यास तथा ‘ सत्यामृत प्रवाह ’ धार्मिक पुस्तक है |

  • अमीर खुसरो [ 1255 ई. – 1324 ई. ] को हिंदी खड़ी बोली को काव्यभाषा के रूप में प्रथम प्रयोगकर्ता कहा जा सकता है | खुसरो की पहेलिया लोक प्रसिद्ध है |

  • अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’[ 1865ई. -1947ई. ] द्वारा लिखित ‘ प्रियप्रवास ’ हिंदी खड़ी बोली का आधुनिक काल का प्रथम महाकाव्य है |

  • खड़ी बोली का अन्य नाम ‘ कौरवी ’ तथा हरियाणवी का अन्य नाम ‘ बांगरू ’ के नाम से भी जाना जाता है |

  • “अपभ्रंश का वाल्मीकि ” स्वयंभू को कहा जाता है |

  • प्रथम सूफी प्रेमाख्यानक कवि मुल्ला दाऊद है | जिनकी रचना ‘ चंदायन ‘ है | जिसका रचनाकाल 1379 ई. है | इस रचना के नायक लोर ( लोरिक ) एंव नायिका चंदा का प्रेम वर्णन किया गया है |

  • ऋग्वेद संस्कृत का प्राचीनतम ग्रंथ है | इस ग्रंथ में 10 मण्डल ,1028 सूक्त एंव 10580 ऋचाएँ है | देवताओं की स्तुतियों से सम्बंधित श्लोक है |

  • अथर्ववेद में जादू – टोने , मंत्र –तंत्र ,टोने –टोटके आदि का वर्णन किया गया है |

  • यजुर्वेद की दो शाखा है – दक्षिण भारत में प्रचलित कृष्ण यजुर्वेद तथा दूसरी उत्तर भारत में प्रचलित शुक्ल यजुर्वेद | इसमें यज्ञ की प्रक्रिया के लिए गद्य एवं पद्य में मंत्र है |

  • सामवेद गीत संगीत प्रधान वेद है | सभी वेदों में आकार की दृष्टि से सबसे छोटा है | इसमें 1875 मंत्रों में 69 को छोड़कर सभी ऋगवेद से लिए गये है | इसकी प्रशंसा में गीता में श्री कृष्ण  कहते है कि – वेदानां सामवेदोsस्मि आर्थात् वेदों में मैं सामवेद हूँ |

  • संस्कृत भाषा का सबसे बड़ा व्याकरण ग्रंथ ‘ अष्टाध्यायी ’ है | जिसे महर्षि पाणिनि ने लिखा है |

  • बौद्ध धर्म का प्रमुख ग्रंथ ‘ त्रिपिटक ’ है | यह ‘ पालि ’ भाषा में लिखा गया है | ‘ त्रिपिटक ’ के तीन भाग हैं – (i) सुत्त पिटक (ii) विनय पिटक (iii) अभिधम्म पिटक |

  • हेमचंद्र ने ‘ प्राकृत व्याकरण ’ की रचना की है |इन्हे प्राकृत के पाणिनि की संज्ञा दी जाती है |

  • अपभ्रंश के महान कवि स्वयंभू हैं |

  • “ वाक्यं रसात्मकं काव्यम् ” ( रस युक्त वाक्य काव्य है ) , आचार्य विश्वनाथ ने काव्य लक्षण की परिभाषा देते हुए कहा था | इनकी प्रसिद्ध काव्य शास्त्र की पुस्तक ‘ साहित्य दर्पण ’ है |  

  • “ शब्दार्थौ सहितौ काव्यम् ” संस्कृतके प्रसिद्ध कवि भामा द्वारा कहा गया है |

  • संतन को कहा सीकरी सों काम , आवत जात पनहियाँ टूटी , बिसरि गयो हरि नाम | यह पद अष्टछाप के प्रसिद्ध कवि कुम्भन दास द्वारा रचित है |

  • घनानंद की प्रसिद्ध उक्ति है – “ अति सूधो सनेह को मारग है ,जहाँ नैकु समापन बांक नहीं ” |

  • “नहि पराग नहिं मघुर मधु नहिं विकास इहि काल | अली कली ही सौं विंध्यौ आगे कौन हवाल” ||यह दोहा बिहारी द्वारा रचित राजा जयसिंह के लिए कहा गया है |

  • “ तू कहता कागज की लेखी ,मैं कहता आखिन की देखी “| नामक प्रसिद्ध उक्ति कबीर दास द्वारा कही गई है |          

  • सूफी मान्यता के अनुसार इश्क मजाजी ( लौकिक प्रेम ) के द्वारा इश्क हकीकी ( ईश्वरीय प्रेम ) को पाया जा सकता है | सूफी मत के अनुसार हक ( ईश्वर ) तक पहुँचने के लिए चार मुकामात ( मंजिलें ) पार करनी पड़ती है , जिनके नाम हैं – शरीयत , तरीकत ,हकीकत , मारिफत | इन्हे पार करके वह परमात्मा से एकाकार हो जाती है |

  • खेती न किसान को भिखारी को न भीख बलि,

    बनिक को बनिज न चाकर को चाकरी ||

  •    महाकवि तुलसीदास की यह प्रसिद्ध पंक्ति ‘ कवितावली ’ से ली गयी है |

  • रीतिकाल को विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने ‘श्रृंगार काल ’ तथा मिश्रबंधु ने ‘ अलंकृत काल ’ कहा है |

  • ‘ मिश्रबंधु विनोद ’ ( 4 भाग ) के रचनाकार मिश्रबंधु हैं | ये तीनों सहोदर भाई थे , जिनके नाम हैं – गणेश बिहारी मिश्र , श्याम बिहारी मिश्र , सुकदेव बिहारी मिश्र | कोई भी रचना ये तीनों भाई मिल कर करते थे |

  • ‘ कबीर वाणी के डिक्टेटर थे ’ यह प्रसिद्ध कथन हजारी प्रसाद द्विवेदी जी द्वारा कहा गया है |

  • जदपि सुजाति सुलच्छनी सुबरन सरस सुवृत्त |

          भूषण बिनु न विराजई कविता बनिता मित्त ||

         यह प्रसिद्ध दोहा अलंकार वादी आचार्य केशव दास द्वारा रचित है |

  • बिहारीलाल के विषय में दो उक्तियाँ बहुत प्रसिद्ध हैं |

  • गागर में सागर भरना | 

  • सतसैया के दोहरे ज्यों नावक के तीर |

          देखन में छोटे लगे घाव करै गम्भीर ||

  • “ आध्यात्मिक रंग के चश्में आजकल बहुत सस्ते हो गये हैं ,उन्हे चढ़ाकर कुछ लोगों को गीत गोविंद ( जयदेव ) के पदों में आध्यात्मिकता दिखती है , वैसे ही ‘ पदावली ’( विद्यापति) के पदों में | – यह कथन रामचंद्र शुक्ल का है |

  • पंडित सअल सत्त बक्खाणइ , देहहि बुद्ध बसंत न जाणइ |, यह काव्य पंक्ति सरहपा की है |

  • ‘ वर्णरत्नाकर ’मैथिली भाषा का प्राचीनतम उपलब्ध ग्रंथ है |

  • “ बालचंद बिज्जावइ भाषा , दुहु नहि लग्गइ दुज्जन हासा ” यह पंक्ति विद्यापति की है |

  • हिंदी काव्य में भ्रमर गीत का मूल स्रोत “ श्रीमद् भागवत पुराण ” के दशम् स्कंध के 46 व 47वें अध्याय से है |

  • हिंदी भारोपीय परिवार की भाषा है |

  • 14 सितम्बर को हिंदी दिवस तथा 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस मनाया जाता है |

  • सांस्कृतिक जागरण सम्बंधि संस्थाएँ

संस्था

संस्थापक

स्थापना वर्ष

आर्य समाज

दयानंद सरस्वती

1875 ई.

प्रार्थना समाज

केशवचंद्र सेन

1867 ई.

रामकृष्ण मिशन

स्वामी विवेकानंद

1897 ई.

ब्रह्म समाज

राजा राम मोहन राय

1828 ई.

थियोसोफिकल सोसायटी

मैडम ब्लावात्सकी और कर्नल अल्कॉट

1875 ई.

  • ‘ निज भाषा उन्नति अहै , सब उन्नति को मूल

            बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल ’

            यह पंक्ति भारतेंदु हरिश्चंद्र जी की है |

  • संदेश नहीं मैं यहा स्वर्ग का लाया ,

         इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया |

         उपरोक्त काव्य पंक्ति मैथिलीशरण गुप्त द्वारा लिखित ‘ साकेत ’ का अंश है |

  • मै ढूँढता तुझे था , जब कुंज और वन में |

             तू खोजता मुझे था, तब दीन के सदन में ||

              तू ‘ आह ’ बन किसी की , मुझको पुकारता था |

               मैं था तुझे बुलाता , संगीत के भजन में ||

              उपरोक्त काव्य पंक्तियों के रचनाकार रामनरेश त्रिपाठी जी है |

  • जिसको नहीं गौरव तथा निज देश का अभिमान है |

           वह नर नहीं नर – पशु निरा है ,और मृतक समान है |

        उपरोक्त काव्य पंक्ति के रचनाकार मैथिलीशरण गुप्त जी है |

  • अपभ्रंश और राजस्थानी भाषा के मेल से बनी भाषा को डिंगल भाषा तथा अपभ्रंश और ब्रजभाषा के मेल से बनी भाषा को पिंगल भाषा का नाम दिया गया है |

  • राहुल सांकृत्यायन ने 7वीं शताब्दी के कवि सरहपाद को हिंदी का पहला कवि माना है |

  • प्लेटो प्रत्ययवाद के प्रवर्तक थे | प्लेटो की प्रसिद्ध रचना ‘ रिपब्लिक ’ है |

    • अष्टछाप की स्थापना सन् 1565 ई. में हुई | अष्टछाप के आठ कवियों में चार वल्लभाचार्य के शिष्य और चार गोसाई विट्ठलनाथ के शिष्य थे | वल्लभाचार्य के शिष्य – सूरदास, कृष्णदास ,परमानंद दास , कुम्भनदास , गोसाई विट्ठलनाथ के शिष्य – गोविंदस्वामी , छीतस्वामी , चतुर्भुजदास ,नन्ददास |

    • “ भ्रमरगीत सूर साहित्य का मुकुटमणि है | यदि वात्सल्य और श्रृंगार के पदों को निकाल दिया जाए तो हिंदी साहित्य में सूर का नाम अमर रखने के लिए भ्रमरगीत ही काफी है | ” यह कथन आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी का है |

    • अब कैसे छुटे राम नाम रट लागी |

    प्रभु जी तुम  चंदन हम पानी जाकी अंग अंग बास समानी ||  

    यह पद रैदास ( रविदास ) जी का है |

    • परमाल रासो का अन्य नाम ‘ आल्हखंड ’ भी है |

    • “ कावा तरुवर पंच विडाल , चंचल चीए पइठो काल ” यह पंक्ति सिद्ध कवि लुइपा का है |

    • “ विभावनुभावव्यभिचारी संयोगाद्रसनिष्पत्ति:” रस के सम्बंध में इस रससूत्र को आचार्य भरतमुनि ने दिया है |

    • कबीर के राम अयोध्या के राजा दशरथ के राम नहीं हैं | कबीर ने जब भी राम शब्द का वाचन किया है ,वहाँ राम से तात्पर्य ब्रह्म से है | जो सृष्टि का नियंता है | परमसत्ता की तरफ इशारा है | स्वंय को जानना ब्रह्मरूप होना कबीर के राम की ओर संकेत है |

    • ‘ आँसू’ जयशंकर प्रसाद जी का प्रसिद्ध विरह काव्य है |

    • अभिव्यंजनावाद के प्रवर्तक क्रोचे हैं |

    • ‘ कुकुरमुत्ता – 1914 ई., सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की बहुचर्चित एक हास्यव्यंग मूलक कविता है | इसमें पूँजीपतियों पर तीखा व्यंग किया गया है |

    • उर्दू के प्रमुख लेखकों व शायरों के नाम – गालिब , जाफर ,फिराख गोरखपुरी , मोहम्मद इकबाल आदि |

    • तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए ,

    झुके कूल सों जल परसन हित मनहुँ सुहाए |

    यह पंक्ति भारतेंदु हरिश्चंद्र जी की है |

    • चंदबरदाई द्वारा लिखित महाकाव्य ‘ पृथ्वीराजा रासो ’ में 69 समय ( सर्ग) है | पृथ्वीराज के राजकवि चंदबरदाई थे |

    • विद्यापति को ‘ मैथिली का कोकिल ’ कहा जाता है |

    • राजभाषा का प्रावधान संविधान की धारा 343 से 351 के अनुच्छेदों में वर्णित है | भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 में संघ की राजभाषा के रूप में हिंदी व देवनागरी को लिपि के रूप में मान्यता मिली | 14 सितम्बर सन् 1949 ई. को हिंदी को राजभाषा के रूप में मान्यता प्रदान की गयी | इसी कारण 14 सितम्बर को प्रतिवर्ष हिंदी दिवस मनाया जाता है |

    • आठवीं अनुसूची की भाषाएँ है – आसमिया , उड़िया , उर्दू , कन्नड़ , कश्मीरी , गुजराती ,तमिल , तेलुगू, पंजाबी , बांग्ला , मराठी , मलयालम , संस्कृत , सिंधी , हिंदी ,नेपाली , कोंकणी, मणिपुरी , बोडो, संथाली ,डोगरी , मैथिली |

    • ‘ ईरानी महाभारत काल से ही भारत को हिंद कहने लगे थे |” यह कथन पं. रामनरेश त्रिपाठी जी का है |

    • विश्व की भाषाओं को मुख्यत: 12 भाषा परिवारों में विभक्ति किया गया है |हिंदी भारोपिय भाषा परिवार की भाषा है | भारतीय आर्य भाषाएँ भारोपीय परिवार की भाषा है |

    • विद्वानों ने वैदिक ध्वनियों की संख्या 52 मानी है | जिसमें 13 स्वर तथा 39 व्यंजन वर्ण हैं |

    • प्रथम प्राकृत भाषा ‘ पालि ’ को कहा जाता है |

    • हिंदी भाषा में दो लिंग है – (i) पुल्लिंग (ii) स्त्रीलिंग

    • हिंदी भाषा में दो वचन होते है – (i)एकवचन (ii) बहुवचन

    • हिंदी भाषा में कारक के आठ भेद होते हैं , – जो इस प्रकार है |

    क्र. सं.

    कारक

    कारक चिह्न

    1

    कर्त्ता कारक

    ने

    2

    कर्म कारक

    को

    3

    करण कारक

    से, के द्वारा

    4

    सम्प्रदान कारक

    के लिए , के हेतु ,के वास्ते

    5

    अपादान कारक

    से ( अलग होने के अर्थ में )

    6

    सम्बंध कारक

    का, की, के, रा, री, रे, ना, नी, ने

    7

    अधिकरण कारक

    में , पै, पर

    8

    सम्बोधन कारक

    अरे! हे! सुनो ! आदि

    • संज्ञा के पाँच भेद हैं – (i) व्यक्तिवाचक संज्ञा (ii) जातिवाचक संज्ञा (iii) भाववाचक संज्ञा (iv) समूह वाचक संज्ञा (v) द्रव्यवाचक संज्ञा

    • सर्वनाम के भेद – प्रयोग के आधार पर सर्वनाम के छ: भेद है – (i) पुरूष वाचक सर्वनाम (ii) निश्चय वाचक सर्वनाम (iii) अनिश्चय वाचक सर्वनाम (iv) सम्बंधवाचक सर्वनाम (v) निजवाचक सर्वनाम (vi) प्रश्नवाचक सर्वनाम

    • विशेषण के चार प्रमुख भेद निम्न है – (i) गुणवाचक विशेषण (ii) परिमाण वाचक विशेषण (iii) संख्यावाचक विशेषण (iv) सार्वनामिक विशेषण

    • रचना के आधार पर क्रिया के मुख्यत: दो भेद है – (i) सकर्मक क्रिया (ii) अकर्मक क्रिया

    अर्थ के आधार पर क्रिया के भेद – अर्थ की दृष्टि से क्रिया के निम्न भेद है – (i) सहायक क्रिया  (ii) संयुक्त क्रिया (iii) नामबोधक क्रिया (iv) पूर्वकालिक क्रिया (v) क्रियार्थक क्रिया (vi) प्रेरणार्थक क्रिया |

    • रचना के आधार पर वाक्य के तीन भेद है –(i) सरल वाक्य (ii) मिश्र वाक्य (iii) संयुक्त वाक्य

    अर्थ के आधार पर वाक्य आठ प्रकार के होते है –(i) विधिवाचक वाक्य (ii) निषेधवाचक वाक्य (iii) आज्ञावाचक वाक्य (iv) विस्मयवाचक वाक्य (v) संदेहवाचक वाक्य (vi) इच्छावाचक वाक्य (vii) संकेतवाचक वाक्य (viii) प्रश्नवाचक वाक्य |

    • समास के छ: भेद है – (i) अव्ययीभाव समास (ii) तत्पुरूष समास (iii) कर्मधारय समास (iv) व्दिगु समास (v) द्वंद्व समास (vi) बहुब्रीहि समास

    • ‘ दोहा ’ या ‘ दूहा ’ अपभ्रंश भाषा का लोकप्रिय छंद रहा है |

    राहुल सांस्कृत्यायन ने सरहपाद को हिंदी का प्रथम कवि माना है | लेकिन सरहपाद का कोई भी ग्रंथ उपलब्ध नहीं है | मुक्तक के रूप में पाये जाते है | हिंदी की प्रथम रचना के रूप में जैन आचार्य देवसेन कृत ‘ श्रावकाचार ’ नामक रचना का उल्लेख किया जा सकता है | इसमें 250 दोहों में श्रावक धर्म का वर्णन किया जा सकता है | इस ग्रंथ की रचना 933 ई. में हुई, जो दोहा छंद में है |

  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ‘ रासो ’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘ रसायण ’ शब्द से मानी है | जिसके सम्बंध में उन्होने नरपति नाल्ह की रचना ‘ बीसलदेव रासो ’ को आधार बनाया है | बीसलदेव रासो की पंक्ति निम्न है –

  • बारह सौ बहोतरां मझारि, जेठ बदी नवमी बुधवारि |

    नाल्ह रसायण आरम्भई शारदा तूठी ब्रह्म कुमारि ||

        ‘ रासो ’ शब्द की व्युत्पत्ति के सम्बंध में अनेक विद्वानों ने भिन्न -भिन्न तर्क दिये है | जो इस प्रकार है –

    फ्रांसीसी विद्वान गार्सा- द- तासी ने रासो शब्द की व्युत्पत्ति ‘ राजसूय ’ शब्द से बताने की कोशिश की है |

        पं. हरिप्रसाद शास्त्री ने रासो शब्द की व्युत्पत्ति ‘ राजयश ’ अथवा ‘ रहस्य ’ से मानी है |

    डॉ. रामकुमार वर्मा और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने  रासो शब्द की व्युत्पत्ति ‘ नाट्यरासक ’ से माना है |

        डॉ. नरोत्तम स्वामी जी ने रासो शब्द की व्युत्पत्ति राजस्थानी भाषा के ‘ रसिक ’ शब्द से मानते है |

        आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने रासो शब्द की व्युत्पत्ति ‘ रस ’ शब्द से माना है |

    • दलपति विजय ने ‘ खुमाण रासो ’ की रचना की थी |आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार इनका रचनाकाल 9वीं शताब्दी है | इनकी भाषा राजस्थानी हिंदी है | काव्यात्मक सरस वर्णन का एक उदाहरण निम्न है –

    पिव चित्तौड़ न आविऊ,सावण पहिली तीज |

    जोवे बाट बिरहिणी खिण खिण अगवै खीज ||

    संदेसो पिण साहिबा , पाछो फिरिय न देह |

    पंछी धाल्या पिंजरै छूटण रो संदेह ||

    • अमीर खुसरो का जन्म 1255 ई. में उत्तर प्रदेश के एटा जिले के पटियाली गाँव में हुआ था | खुसरो अलाउद्दीन के दरबारी कवि एवं निजामुद्दीन औलिया के शिष्य थे | इनकी मृत्यु 1324 ई. में हुई थी | इनके ग्रंथों की संख्या 100 बताई जाती है | परंतु 20-21 ग्रंथ ही उपलब्ध है | इनकी प्रसिद्ध रचनाएँ है – पहेलियाँ, मुकरियाँ , खालिकबारी, दो सखुने , गजल आदि | अमीर खुसरो को हिंदी खड़ी बोली का प्रथम कवि माना जाता है | खुसरो जी को “ तोताएँ हिंद ” या “ हिंद की तूती ” कहा जाता है | खुसरो की प्रमुख पहेलियाँ और मुकरियाँ इस प्रकार है –

    • स्याम बरन की है एक नारी

         माथे ऊपर लागै प्यारी |

         जो मानुस इस अरथ को खोले ,

        कुत्ते की वह बोली बोले | ( उत्तर – भौं )

    • गोल-मटोल और छोटा-मोटा

    हरदम वह तो जमीं पर लोटा |

    खुसरो कहे नहीं है झूठा ,

    जो न बुझे अकिल का खोटा ||( उत्तर – लोटा)

    • एक गुनी ने यह गुन कीना ,

    हरियल पिंजरे में दे दीना |

    देखा जादूगरका हाल ,

    दाले हरा निकाले लाल || ( उत्तर – पान )

    • आगे – आगे बहिना आई ,

    पीछे – पीछे भईया |

    दाँत निकाले बाबा आए ,

    बुरका ओढ़े मइया || ( उत्तर –भुट्टा )

    • लिपट – लिपट के वा के सोई ,

    छाती से छाती लगा के रोई |

    दाँत से दाँत बजे तो ताड़ा ,

    ऐ सखि साजन ? ना सकि जाड़ा ||

    • सेज पड़ी मोरे आँखों आए ,

    डाल सेज मोहे मजा दिखाए |

    किससे कहूं अब मजा में अपना ,

    ऐ सखि साजन ? ना सखि सपना | |

    • हिंदी भाषा में पहेली शब्द संस्कृत के “ प्रहेलिका ” शब्द का अपभ्रंश या तद्भव रूप है |

    • भक्ति का सर्वप्रथम उल्लेख उपनिषद् में मिलता है | भक्ति भावना मूलत: दक्षिण भारत में उत्पन्न हुई | भक्ति आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार करने में कुछ प्रमुख आचार्यों का योगदान रहा है | जिसमें प्रमुख रूप से मध्वाचार्य, रामानंद, वल्लभाचार्य ,नामदेव ,जयदेव आदि रहे हैं |

    • आलवार संतो का परिचय- आलवार तमिल कवि एवं संत थे | दक्षिण भारत में भक्ति परम्परा 6वीं शताब्दी से चली आ रही है | आलवार वस्तुत: वैष्णवों का तमिल नाम है | दक्षिण भारात में वैष्णव भक्तों को आलवार भक्तों के नाम से जाना जाता है | आलवार का तमिल अर्थ है – भगवान में डूबा हुआ |आलवार संत भक्ति आंदोलन के जन्मदाता माने जाते है | आलवार संतों का मुख्य उद्देश्य जनमानस में भक्ति भाव को जगाना व आस्तिकता का प्रचार – प्रसार करना था | आलवार संतों की संख्या 12 थी | इन्होने घोषणा किया कि भगवान की भक्ति करने का अधिकार समान रूप से सभी को है इसमें कुछ आलवार निम्न जाति के भी थे | इन्होने समस्त तमिल प्रदेश में पदयात्रा कर भक्ति का प्रचार किया |इनके पदों का संग्रह ‘ दिव्य प्रबंधम् ’ के नाम से जाना जाता है | जिससे लगभग 4000 पद है | इसमें भक्ति और ज्ञान का अनमोल भण्डार है | इनके पद वेदों के तुल्य माना जाता है | प्रमुख आलवार भक्तों की संख्या 12 है , जो निम्न प्रकार है :-

    • पोरगे आलवार

    • भूक्तालवार

    • मयालवार

    • तिरुमालिसै आलवार

    • नम्मालवार

    • मधुरकवि आलवार

    • कुलशेखरालवार

    • पेरियालवार

    • अण्डाल

    • तांण्डरडिप्पोडियालवार

    • तिरुरपाणोलवार

    • तिरूमगैयालवार        

                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                            


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