कृष्ण काव्य धारा : सामान्य परिचय –

कृष्ण काव्य धारा का तात्पर्य उन भक्ति कवियों से हैं | जिन्होने भगवान कृष्ण को आराध्य मानकर अपनी रचनाएँ लिखी है | कृष्ण काव्य धारा के प्रवर्तक कवि महात्मा सूरदास है | कृष्ण भक्त कवियों की एक लम्बी श्रृंखला है | कृष्ण भक्त कवियों ने अपना सबकुछ भगवान कृष्ण के चरणों मे समर्पित कर दिया | कृष्ण भक्त प्रमुख कवियों एवं आचार्यो का विवरण निम्न प्रकार है |

कृष्ण काव्य के सम्प्रदाय – प्रवर्तक प्रमुख आचार्य –

इस धारा के प्रमुख आचार्यो का परिचय इस प्रकार है –
बल्लभाचार्य (1469 ई0 – 1530 ई0 ) – इनका जन्म और मृत्यु दोनो बनारस मे हुई थी ‌| ये ‘बल्लभ सम्प्रदाय’ के प्रवर्तक आचार्य थे | ये तेलगु ब्राह्मण भक्त लक्ष्मण भट्ट के पुत्र थे |
बल्लभ सम्प्रदाय का सिद्धांत पक्ष शुद्धाव्दैत और साधना पक्ष को ‘पुष्ट मार्ग’ कहा जाता है | पुष्ट शब्द भागवत पुराण के ‘पोषणम् तद्नुग्रह’ से लिया गया है | भगवत या अनुग्रह कृपा को पुष्ट कहा जाता है |

आचार्य बल्लभाचार्य जी के प्रमुख ग्रंथ इस प्रकार है –
(i) अणुभाष्य
(ii) सुबोधिनी टीका
(iii) तत्व निबंध
(iv) जैमिनीय पूर्व मीमांसा
(v) सूत्रभाष्य
(vi) कृष्णाश्रय
(vii) पुष्टिप्रवाहमर्यादा आदि

2. आचार्य निम्बार्क – डा0 भण्डारकर के अनुसार निम्बार्क का जन्म 1162 ई0 के आस – पास हुआ था | निम्बार्क का प्रारम्भिक नाम आरुणि था | इनके शैशव का जन्म नियमानंद था | निम्बार्क ने ‘व्दैताव्दैतवाद’ का प्रवर्तन किया | इन्होने ‘सनक सम्प्रदाय की स्थापना की’ | निम्बार्क के चार शिष्य – श्री निवासाचार्य , श्री अवदुम्बराचार्य , श्री गौरमुखाचार्य , श्री लक्ष्मण भट्ट थे | निम्बार्क को भगवत कृष्ण के सुदर्शन चक्र का अवतार माना जाता है | कुछ विद्वानो के अनुसार अत्यंत सुंदर होने के कारण इन्हे सुदर्शन कहते थे |

इनके ग्रंथ इस प्रकार है –
(i) वेदांत परिजात सौरभव
(ii) दशलोकी
(iii) श्री कृष्ण अस्तवराज
(iv) मंत्र रहस्य षोडसी
(v) प्रपन्नकल्पवल्ली

3. आचार्य हितहरिवंश – आचार्य हितहरिवंश ने ‘राधा बल्लभ सम्प्रदाय’ की स्थापना 1534 ई0 मे वृन्दावन मे किया इस सम्प्रदाय में ‘प्रेम’ को ही भक्त का आधार माना जाता है | नित्य विहार दर्शन ही सहचरी (जीवात्मा) का उपास्य भाव है | इस सम्प्रदाय मे उपासना का आधार रस है | राधा को कृष्ण से भी उच्च स्थान पर रखकर उपासना की जाती है | राधा स्वयं आनंद रुपा नित्य भाव है | इस सम्प्रदाय के मंदिरो मे श्री कृष्ण के वाम योग में एक वस्त्र निर्मित गद्दी होती है, जिसके ऊपर स्वर्ण पत्र पर ‘श्री राधा’ शब्द अंकित रहता है | इसे ‘गद्दी सेना’ कहते है |

4. स्वामी हरिदास – (1490 ई0 – 1575 ई0 लगभग ) सखी या टट्टी सम्प्रदाय के प्रवर्तक स्वामी हरिदास थे | इनके 200 वर्ष पश्चात् होने वाले इसी सम्प्रदाय के ललित मोहन जी वृन्दावन मे बाँस की टट्टियों का घर बनाकर रहते थे| इसी कारण इसका एक नाम टट्टी सम्प्रदाय भी हो गया | सर्वप्रथम मिश्र बंधुओं ने इसे टट्टी सम्प्रदाय कहने की शुरुवात की |

सखी सम्प्रदाय का उपास्य ‘प्रेम’ नामक तत्व है | स्वामी हरिदास जी की राधा वृषभानु कुमारी नही हैं | ब्रज की लीला नैमित्तिकी लीला है |स्वामी हरिदास के उपास्य प्रेम के मूल स्वरुप नित्य निकुंज बिहारी है | जिनको सृष्टि निर्माण आदि से कोई मतलब नही है |

5. कृष्ण चैतन्य महा प्रभु – (1486 ई0 – 1534 ई0 ) गौडीय सम्प्रदाय के प्रवर्तक कृष्ण चैतन्य का जन्म बंगाल के नवदीप नामक स्थान पर हुआ था| इनके बचपन के नाम विश्वम्भर या निमाई था | रुप सौंदर्य की अतिशयता के कारण इन्हे गौरांग भी कहा जाता था | इनके दीक्षा गुरु केशव भारती ने इनका नाम चैतन्य रखा | ‘संकीर्तन प्रथा’ का जन्म चैतन्य ने ही किया था |

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अष्टछाप के कृष्ण भक्त कवि – अष्टछाप की स्थापना गोस्वामी विट्ठल नाथ ने 1565 ई0 में की थी | गोस्वामी विट्ठल नाथ ने आठ कवियों का एक समूह बनाया जो अष्टसखा या अष्टछाप नाम से प्रसिद्ध है | इन आठ भक्त कवियों मे चार बल्लभाचार्य के शिष्य थे , तथा चार गोस्वामी विट्ठल नाथ के शिष्य थे |
बल्लभाचार्य के शिष्य – सूरदास , कुम्भन दास, परमानन्द और कृष्णदास |
गोस्वामी विट्ठल दास के शिष्य – नंद दास, गोविंद स्वामी , छीतस्वामी और चतुर्भुज दास |

कृष्ण भक्त कवियों की चर्चा जिन ग्रंथो में हैं उनके नाम इस प्रकार है –
(i) चौरासी वैष्णवन की वर्त्ता , दो सौ बावन वैष्णवन की वर्त्ता —- गोकुल नाथ
(ii) भक्तमाल —- नाभा दास
(iii) भाव प्रकाश —– हरिराय
(iv) वल्लभ दिग्विजय —– यदुनाथ

इन अष्टछाप कवियों का वर्णन निम्न प्रकार है –

सूरदास – महाकवि सूरदास जी का जन्म 1478 ई0 स्थिर किया जाता है | आगरा के समीपवर्ती रुनकता नामक ग्राम मे हुआ था | इनका जन्म किसी सारस्वत ब्राह्मण कुल मे हुआ था | उनके जन्मांध होने या बाद मे अंधत्व प्राप्त करने के विषय मे अनेक किंवदंतियाँ एवं प्रवाद फैले हुए है | इनका गोलोक वास लगभग 1583 ई0 में मथुरा के निकट पारसौली नामक ग्राम मे हुआ था | इनकी मृत्यु पर गोसाई विट्ठल नाथ ने शोकार्त्त होकर कहा था ‘पुष्टिमारग को जहाज जात है सो जाको कहु लेना होय सो लेउ’ |

सूरदास अष्टछाप के कवियों मे सर्वोच्च स्थान है | इन्हे कृष्ण काव्य का प्रतिनिधि कवि कहा जाता है |सूर की भक्ति पद्धति का मेरूदण्ड पुष्टि मार्गीय भक्ति है | इस मार्ग मे भगवान के अनुग्रह पर ही सर्वाधिक बल दिया जाता है | भगवान का अनुग्रह ही भक्त का कण्याण करके उसे इस लोक से मुक्त करने मे सफल होता है |

सूरदास ने अनेक ग्रंथो की रचना की, परंतु उनके अतिप्रसिद्ध ग्रंथो का विवरण इस प्रकार है –
(i) सूरसागर
(ii) सूरसरावली
(iii) साहित्य लहरी

2. नंद दास – (1533 ई0 – 1583 ई0 )- दो सौ बावन वैष्णवन की वार्त्ता और अष्टसखान की वार्त्ता मे इन्हे तुलसीदास का चचेरा भाई बताया गया है | आचार्य रामचंद्र शुक्ल इसे प्रामाणिक नही मानते अष्टछाप के कवियों मे सूरदास के बाद नंददास को प्रमुख स्थान दिया जाता है | इनके सम्बंध मे प्रसिद्ध कहावत है –

‘और कवि गढिया नंददास जडिया’
नंददास जी ने विधिवत शास्त्रानुशीलन किया था | उनकी प्रतिभा बहुमुखी थी | इनके द्वारा रचित पंद्रह ग्रंथ इस प्रकार है –
(i) अनेकार्थमंजरी
(ii) मानमंजरी
(iii) रसमंजरी
(iv) रूपमंजरी
(v) विरहमंजरी
(vi) प्रेमबारहखडी
(vii) श्यामसगाई
(viii) सुदामाचरित
(ix) रुक्मिणीमंगल
(x) भँवरगीत
(xi) रासपंचाध्यायी
(xii) सिद्धांत – पंचाध्यायी
(xiii) दशमस्कंधभाषा
(xiv) गोबर्धनलीला
(xv) नंददास पदावली

3. कुम्भनदास – (1468 ई0 1583 ई0 ) – कुम्भनदास का चरित ‘चौरासी वैष्णवन की वार्त्ता’ के अनुसार संकलित किया जाता है | ये ब्रज मे गोबर्धन पर्वत से दूर ‘जमुनावती’ नामक गाँव मे रहते थे | इन्होने 1492 ई0 मे महाप्रभु बल्लभाचार्य से दीक्षा ग्रहण की थी | कुम्भनदास जी क्षत्रिय थे और विवाहित थे | ये अकबर के समकालीन थे |

एक किवदंती है कि किसी गायक ने एक बार उनका कोई उनका सुंदर पद बादशाह अकबर को सुनाया जिसे सुनकर वे इतने मुग्ध हुए कि उन्होने इस पद के रचयिता से ही पद सुनना चाहा और कुम्भनदास जी को सीकरी आने का निमंत्रण दिया | कुम्भनदास जी ने सम्राट के समक्ष जो पद गा कर सुनाया, वह इस प्रकार है –

सन्तन को कहाँ सिकरी सो काम ||
आवत जात पन्हैया टूटी बिसरि गयो हरिनाम ||
जाको देखे दु:ख लागै ताकौ करन परी परनाम ||
कुंभनदास लाल गिरिधर विन यह सब झूठो धाम ||

अकबर उनकी भगवत भक्त से इतना प्रसन्न हुआ कि उनसे अनुरोध किया कि वे कुछ माँग ले | इस पर कुम्भनदास जी ने यही इच्छा प्रकट की कि भविष्य मे मुझे सीकरी मत बुलाना |

4. परमानंद दास – इनका जन्म 1493 ई0 माना जाता है | इन्हे संगीत का विशेष ज्ञान था | अष्टछाप के कवियों मे काव्य सौष्ठव की दृष्टि से सूरदास और नंददास के बाद इन्हीं का स्थान है | बल्लभाचार्य से इन्होनें अरैल (प्रयाग ) मे दीक्षा ग्रहण की | इन्होने अपनी रचनाए ब्रज भाषा मे लिखी है |

इनके रचनाओ का विवरण निम्नलिखित है –
(i) परमानंद सागर
(ii) परमानंद के पद
(iii) बल्लभसम्प्रदायी कीर्तन पद संग्रह

5 .कृष्ण दास – इनका जन्म 1496 ई0 में गुजरात में हुआ था | ये जाति के कुंबी थे | श्री नाथ जी के मंदिर के प्रधान प्रबंधक थे | कृष्ण दास के पदो की भाषा शुद्ध ब्रज भाषा है | कहा जाता है कि एक सुंदर वैश्या बडे ही सुरीले कण्ठ से गान करती थी | कृष्ण दास उसे आगरा से उसे गोबर्धन ले आये | वह वैश्या एक दिन भाव – विभोर होकर कृष्ण दास द्वारा रचित एक पद का गायन कर रही थी | गायन समाप्त होते ही उसने प्राण विसर्जित कर दी |

वह पद इस प्रकार है –
मो मन गिरधर छबि पर अटक्यो |
ललित त्रिभंगी अंगन पर चलि , गयो तंहाई ठटक्यौ
सजल श्याम घन चरननील हवै, फिर चित अनत न भटक्यो |
कृष्ण दास कियो प्राण निछावर, यह तन जग सिर पटक्यौ ||

6. गोविंद स्वामी – गोविंद स्वामी का जन्म राजस्थान के भरतपुर राज्य के अंतर्गत आंतरी गाँव में 1505 ई0 मे हुआ था | 1535 ई0 मे इन्होनें गोस्वामी बिट्ठल नाथ जी से विधिवत पुष्टि मार्ग की दीक्षा ग्रहण की और अष्टछाप मे सम्मिलित हो गये | इनके द्वारा रचित 600 पद बताये जाते है | इनके रचनाओ का संकलन ‘गोविंद स्वामी के पद’ नाम से संकलित है |

7. छीतस्वामी – (1515 ई0 – 1550 ई0 )- छीतस्वामी मथुरा के चतुर्वेदी ब्राह्मण थे | घर में जजमानी और पण्डागिरि होती थी | यौवनावस्था मे उद्दंड प्रकृति के कारण ये लडाई – झगडे के लिये बदलाम थे , और छीतू चौबे के नाम से प्रसिद्ध थे | इन्होने जो स्फुट पद रचना की वही पदावली के नाम से प्रसिद्ध है , जिससे लगभग 200 पद संकलित है | इनकी कविता साधारण कोटि की है |

8. चतुर्भुजदास – ये अष्टछापी कवि कुम्भनदास के सबसे छोटे पुत्र थे , तथा गोसाई बिट्ठलनाथ के शिष्य थे | श्रीनाथ जी के मंदिर में जिस प्रकार के पद गाये जाते थे , उन्ही के अनुकरण पर पद लिखे है | * * * * *

निम्बार्क सम्प्रदाय के कृष्ण भक्त कवि

– इस सम्प्रदाय के संस्थापक निम्बार्काचार्य हैं | डा.भंडारकर ने इनका समय 1162 ई. के आस-पास माना है | इनका जन्म दक्षिण प्रांत में हुआ था, परंतु उनकी कर्मभूमि ब्रजमण्डल रही |निम्बार्क का दार्शनिक सिद्धांत “द्वैताद्वैतवाद” है | इन्होने पाँच ग्रंथों का प्रणयन किया | जो निम्न है –

1. वेदांत पारिजात सौरभ
2. दशश्लोकी
3. श्रीकृष्णस्तवराज
4. मंत्ररहस्यषोडशी
5. प्रपन्नकल्पवल्ली

इस सम्प्रदाय के कवियों का संक्षेप में परिचय इस प्रकार है –

(क) श्रीभट्ट– श्री नारायण दास जी “नाभा”ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘भक्तमाल’में श्रीभट्ट जी को कृष्ण की लीलाओं का वर्णन करने वाला ,भगवत भक्ति का प्रचारक और सुकवि व अज्ञान का हर्त्ता बताया है | मथुरा में ध्रुव टीला इनका जन्म स्थान कहा जाता है , जो निम्बार्क सम्प्रदाय के भक्तों के लिये पूज्यनीय है |
इनका ब्रजभाषा में लिखित एक ही ग्रंथ – युगल शतक है | इसमें लगभग 100 पद है |रचना काल 1595 ई. है |

(ख) हरिव्यास देव – नाभा दास जी ने ‘भक्तमाल ‘में इन्हे श्री भट्ट जी का शिष्य बताया है |

इनके लिखे ग्रन्थ निम्न है –

संस्कृत भाषा के ग्रंथ –

1. सिद्धांतरत्नांजलि
2. निम्बार्काष्टोत्तरशतनाम
3. तत्त्वार्थपंचक
4. पंचसंस्कार निरूपण

हिंदी भाषा का ग्रंथ –

1. महावाणी (यह ब्रजभाषा का ग्रंथ है )

(ग) परसुराम देव

ये हरिव्यास देव जी के प्रमुख शिष्य थे | ये ही निम्बार्क सम्प्रदाय की गद्दी को ब्रज से सलेमाबाद ले गये |इनका प्रसिद्ध ग्रंथ “परसुराम सागर “ है |


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