धर्मदास [1433-1543 ई. ]-

धर्मदास सम्पन्न एवं धनवान व्यक्ति थे |महात्मा कबीर से दीक्षा लेने के बाद इन्होने अपनी सारी सम्पत्ति लुटा दी |

धर्मदास कबीर के प्रधान शिष्यों में थे | इन्होने कबीर की वाणी का संकलन किया था | इन्हे समाज का बहुत गहरा ज्ञान था |

इनके कुछ पद प्रस्तुत है –

(1)
मितऊ मड़ैया सूनी करि गैलो ||
अपना बलम परदेस निकरि गैलो, हमरा के कछुवौ न गुन दै गैलो |
जोगिन होइके मैं वन वन ढूँढो, हमरा के बिरह बैराग दै गैलो |
सँग की सखी सब पार उतरि गइलो, हम धनि ठाढ़ि अकेली रहि गैलो |
धरमदास यह अरजु करतु है , सार सबद सुमिरन दै गैलो |

(2)
झरिलागै महलिया, गगन घहराय।
खन गरजै, खन बिजरी चमकै, लहर उठै सोभा बरनि न जाय॥
सुन्न महल से अमरित बरसै, प्रेम अनंद होइ साध नहाय॥
खुली किवरिया मिटी अंधियरिया, धन सतगुरु जिन दिया है लखाय॥
‘धरमदास बिनवै कर जोरी, सतगुरु चरन मैं रहत समाय॥

(3)
सूतल मैं रहलौं सखियाँ विष कर आगर हो
सतगुरु दिहलै जगाई पाचौं सुख सागर हौ।। 1।।
जब रहली जननी के ओदर, परन सम्हारल हो
जब लौ तन में प्रान, न तोहि बिसराइब हो ।। 2।।
एक बुन्द से साहेब मन्दिल, बनावल हो
बिना नेंव के मन्दिल, बहु कल लागल हो ।। 3।।
इहवाँ गाँव न ठाँव नहीं पुर पाटन हो
नाहिन बाट बटोही नहीं हित आपन हो ।। 4।।

(4)
ब्याह जे हमरो करि दिहो बाबा, तोरा से न होयत निर्वाह हो॥टेक॥
बूढ़ नहिं वयस तरुनि नहिं बालक, ऐसो वर योग हमार हो॥1॥
चंदन लकड़ी मँगाइह बाबा, अक्षय वट के मूल हे,
ऊँच के मड़वा बाँधिह हो बाबा, नेहुरि न कंत हमार हो॥2॥
सतपुर से वर मँगाइह बाबा, कोहवर दसमी दुआर हो,
पाँच सजन मिलि मड़वा बैठिह बाबा, करिह कन्यादान हो॥3॥
सुखसागर से सेन्दुर मँगाइह, पिया से दिएयह मोर माँग हो,
मोट के सेन्दुर दिएयह हो बाबा, झलकत जात ससुरार हो॥4॥
अबकि चूक बकसु मोर साहब, जनम-जनम होइब चेरि हो,
अकरम काटि सकल भरम मेटि गेल, चीन्ह पड़ल जमजाल हो॥5॥
नाम पान जीव के चाखन दिहलिन, शब्द सुरति सहिदान हो,
शब्द घोड़ा चढ़ी ब्याहन आयल, सब सखी मंगल गायल हो॥6॥


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